ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण क्षमा कर दीजिये। अब मैं पुनः यमुना-तटपर स्थित गोकुलमें अपने घर नहीं जाऊँगा। भला, आप ही बताइये, वहाँ जाकर मैं यशोदा तथा तुम्हारी प्रेयसी राधिकाको भी क्या उत्तर दूँगा और तुम्हारे प्रेमपात्र गोपबालकोंसे क्या कहूँगा ? नारद ! इतना कहकर नन्दजी सभामें ही मूर्च्छित हो गये। तब जगदीश्वर श्रीकृष्ण उसी क्षण उन्हें गोदमें लेकर समझाने लगे। (अध्याय ८७) श्रीकृष्णका नन्दको दुर्गा-स्तोत्र सुनाना तथा व्रज लौट जानेका आदेश देना, नन्दका श्रीकृष्णसे चारों युगोंके धर्मका वर्णन करनेके लिये प्रार्थना करना श्रीकृष्णने कहा- हे तात ! चेत करो। पिताजी ! होशमें आ जाओ। अरे ! चराचरसहित यह सारा संसार जलके बुलबुलेकी भाँति क्षणध्वंसी है; अतः महाभाग ! मोह त्याग दो और उन महाभागा मायाकी- जो परात्परा, ब्रह्मस्वरूपा, परमोत्कृष्टा, सम्पूर्ण मोहका उच्छेद करनेवाली, मुक्ति-प्रदायिनी और सनातनी विष्णुमाया हैं- स्तुति करो। नन्दजी ! त्रिपुर-वधके समय भयंकर महायुद्धमें भयभीत होनेपर शम्भुने जिस स्तोत्रद्वारा स्तवन करके महामायाके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था, वह स्तोत्रराज, जो सारे अज्ञानका उच्छेदक और सम्पूर्ण मनोरथोंका पूरक है; मैं आपको इस सभामें प्रदान करूँगा, सुनिये। श्रीनन्दजी बोले-जगदीश्वर ! तुम वेदोंके उत्पादक, निर्गुण और परात्पर हो; अतः भक्तवत्सल ! मनुष्योंके सम्पूर्ण विघ्नोंके विनाश, दुःखोंके प्रशमन, विभूति, यश और मनोरथ-सिद्धिके लिये दुर्गतिनाशिनी जगज्जननी महादेवीका वह परम दुर्लभ, गोपनीय, परमोत्तम एकमात्र स्तोत्र मुझ विनीत भक्तको अवश्य प्रदान करो। श्रीभगवान्ने कहा- वैश्येन्द्र ! पूर्वकालमें नारायणके उपदेश तथा ब्रह्माकी प्रेरणासे युद्धसे भयभीत हुए भगवान् शंकरने जिसके द्वारा स्तवन किया था और जो मोह-पाशको काटनेवाला है; उस परम अद्भुत स्तोत्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। नारायणने शिवको शत्रुके चंगुलमें फँसा देखकर यह स्तोत्र ब्रह्माको बतलाया; तब ब्रह्माने रणक्षेत्रमें रथपर पड़े हुए शिवको बतलाते हुए कहा- 'शंकर ! शूरवीरोंद्वारा प्राप्त हुए संकटकी शान्तिके लिये तुम उन दुर्गतिनाशिनी दुर्गाका- जो आद्या, मूलप्रकृति और ब्रह्मस्वरूपिणी हैं - स्तवन करो। सुरेश्वर ! यह मैं तुमसे श्रीहरिकी प्रेरणासे कह रहा हूँ; क्योंकि शक्तिकी सहायताके बिना कौन किसको जीत सकता है?' ब्रह्माकी बात सुनकर शंकरने स्नान करके धुले हुए वस्त्र धारण किये, फिर चरणोंको धोकर हाथमें कुश ले आचमन किया। इस प्रकार पवित्र हो भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर और अञ्जलि बाँधकर वे विष्णुका ध्यान करते हुए दुर्गाका स्मरण करने लगे। श्रीमहादेवजीने कहा- दुर्गर्तिका विनाश करनेवाली महादेवि दुर्गे ! मैं शत्रुके चंगुलमें फँस गया हूँ; अतः कृपामयि ! मुझ अनुरक्त भक्तकी रक्षा करो, रक्षा करो। महाभागे जगदम्बिके ! विष्णुमाया, नारायणी, सनातनी, ब्रह्मस्वरूपा, परमा और नित्यानन्दस्वरूपिणी - ये तुम्हारे ही नाम हैं। तुम ब्रह्मा आदि देवताओंकी जननी हो। तुम्हीं सगुण-रूपसे साकार और निर्गुण-रूपसे निराकार हो। सनातनि ! तुम्हीं मायाके वशीभूत हो पुरुष और मायासे स्वयं प्रकृति बन जाती हो तथा जो इन पुरुष-प्रकृतिसे परे है; उस परब्रह्मको तुम धारण करती हो। तुम वेदोंकी माता परात्परा सावित्री हो। वैकुण्ठमें समस्त सम्पत्तियोंकी स्वरूपभूता महालक्ष्मी, क्षीरसागरमें शेषशायी नारायणकी प्रियतमा मर्त्यलक्ष्मी, स्वर्गमें