भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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श्रीकृष्णजन्मखण्ड

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स्वर्गलक्ष्मी और भूतलपर राजलक्ष्मी तुम्हीं हो। तुम पातालमें नागादिलक्ष्मी, घरोंमें गृहदेवता, सर्वशस्यस्वरूपा तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्योंका विधान करनेवाली हो। तुम्हीं ब्रह्माकी रागाधिष्ठात्री देवी सरस्वती हो और परमात्मा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिदेवी भी तुम्हीं हो। तुम गोलोकमें श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर शोभा पानेवाली गोलोककी अधिष्ठात्री देवी स्वयं राधा, वृन्दावनमें होनेवाले रासमण्डलमें सौन्दर्यशालिनी वृन्दावनविनोदिनी तथा चित्रावली नामसे प्रसिद्ध शतशृङ्गपर्वतकी अधिदेवी हो। तुम किसी कल्पमें दक्षकी कन्या और किसी कल्पमें हिमालयकी पुत्री हो जाती हो। देवमाता अदिति और सबकी आधारस्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। तुम्हीं गङ्गा, तुलसी, स्वाहा, स्वधा और सती हो। समस्त देवाङ्गनाएँ तुम्हारे अंशांशकी अंशकलासे उत्पन्न हुई हैं। देवि! स्त्री, पुरुष और नपुंसक तुम्हारे ही रूप हैं। तुम वृक्षोंमें वृक्षरूपा हो और अंकुर-रूपसे तुम्हारा सृजन हुआ है। तुम अग्निमें दाहिका शक्ति, जलमें शीतलता, सूर्यमें सदा तेजःस्वरूप तथा कान्तिरूप, पृथ्वीमें गन्धरूप, आकाशमें शब्दरूप, चन्द्रमा और कमलसमूहमें सदा शोभारूप, सृष्टिमें सृष्टिस्वरूप, पालन-कार्यमें भलीभाँति पालन करनेवाली, संहारकालमें महामारी और जलमें जलरूपसे वर्तमान रहती हो। तुम्हीं क्षुधा, तुम्हीं दया, तुम्हीं निद्रा, तुम्हीं तृष्णा, तुम्हीं बुद्धिरूपिणी, तुम्हीं तुष्टि, तुम्हीं पुष्टि, तुम्हीं श्रद्धा और तुम्हीं स्वयं क्षमा हो। तुम स्वयं शान्ति, भ्रान्ति और कान्ति हो तथा कीर्ति भी तुम्हीं हो। तुम लज्जा तथा भोग-मोक्ष-स्वरूपिणी माया हो। तुम सर्वशक्तिस्वरूपा और सम्पूर्ण सम्पत्ति प्रदान करनेवाली हो। वेदमें भी तुम अनिर्वचनीय हो, अतः कोई भी तुम्हें यथार्थरूपसे नहीं जानता। सुरेश्वरि! न तो सहस्र मुखवाले शेष तुम्हारा स्तवन करनेमें समर्थ हैं, न वेदोंमें वर्णन करनेकी शक्ति है और न सरस्वती ही तुम्हारा बखान कर सकती हैं; फिर कोई विद्वान् कैसे कर सकता है? महेश्वरि! जिसका स्तवन स्वयं ब्रह्मा और सनातन भगवान् विष्णु नहीं कर सकते, उसकी स्तुति युद्धसे भयभीत हुआ मैं अपने पाँच मुखोंद्वारा कैसे कर सकता हूँ? अतः महामाये! तुम मुझपर कृपा करके मेरे शत्रु का विनाश कर दो। करुणासहित यों कहकर रणक्षेत्रमें शिवजीके रथपर गिर जानेपर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमती दुर्गा प्रकट हो गयीं। उस समय परमात्मा नारायणने कृपापरवश हो उन्हें प्रेरित किया था। तब वे महादेवी शीघ्र ही शिवके समक्ष खड़ी हो उनके मङ्गल और विजयके लिये यों बोलीं— 'शिव! मायाशक्तिका आश्रय लेकर असुरका संहार करो*।'


* श्रीमहादेव उवाच

रक्ष रक्ष महादेवि दुर्गे दुर्गतिनाशिनि। मां भक्तमनुरक्तं च शत्रुग्रस्तं कृपामयि॥
विष्णुमाये महाभागे नारायणि सनातनि। ब्रह्मस्वरूपे परमे नित्यानन्दस्वरूपिणि॥
त्वं च ब्रह्मादिदेवानाम्म्बिके जगदम्बिके। त्वं साकारे च गुणतो निराकारे च निर्गुणात्॥
मायया पुरुषस्त्वं च मायया प्रकृतिः स्वयम्। तयोः परं ब्रह्म परं त्वं बिभर्षि सनातनि॥
वेदानां जननी त्वं च सावित्री च परात्परा। वैकुण्ठे च महालक्ष्मीः सर्वसम्पत्स्वरूपिणी॥
मर्त्यलक्ष्मीश्च क्षीरोदे कामिनी शेषशायिनः। स्वर्गेषु स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं राजलक्ष्मीश्च भूतले॥
नागादिलक्ष्मीः पाताले गृहेषु गृहदेवता। सर्वशस्यस्वरूपा त्वं सर्वैश्वर्यविधायिनी॥
रागाधिष्ठातृदेवी त्वं ब्रह्मणश्च सरस्वती। प्राणानामधिदेवी त्वं कृष्णस्य परमात्मनः॥
गोलोके च स्वयं राधा श्रीकृष्णस्यैव वक्षसि। गोलोकाधिष्ठिता देवी वृन्दावनवने वने॥
श्रीरासमण्डले रम्या वृन्दावनविनोदिनी। शतशृङ्गाधिदेवी त्वं नाम्ना चित्रावलीति च॥
दक्षकन्या कुत्र कल्पे कुत्र कल्पे च शैलजा। देवमातादितिस्त्वं च सर्वाधारा वसुन्धरा॥
त्वमेव गङ्गा तुलसी त्वं च स्वाहा स्वधा सती। त्वदंशांशांशकलया सर्वदेवादियोषितः॥