भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 722
७१२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

श्रीदुर्गाने कहा—शंकर! तुम्हारा कल्याण हो! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह वर माँग लो। चूँकि तुम समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ हो; अतः मैं तुम्हें विजय प्रदान करूँगी।

श्रीमहादेवजी बोले—परमेश्वरि! तुम आद्या सनातनी शक्ति हो; अतः दुर्गे! 'दैत्यका विनाश हो जाय'—यह मेरा अभीष्ट वर मुझे प्रदान करो।

भगवतीने कहा—महाभाग! तुम तो स्वयं ही भगवान् विधाता और ज्योतिर्मय परमेश्वर हो; अतः जगद्गुरो! श्रीहरिका स्मरण करो और इस दैत्यको जीत लो।

इसी बीच सर्वव्यापी विष्णुने अपनी एक कलासे वृषका रूप धारण किया और शूलपाणि शंकरके उस उग्र रथको, जिसका पहिया ऊपर उठ गया था, प्रकृतिस्थ कर दिया। तत्पश्चात् उसे अपने सिरपर उठा लिया। उन्होंने शंकरको एक मन्त्रपूत शस्त्र भी प्रदान किया। तब शंकरने उस शस्त्रको लेकर और विष्णु तथा महेश्वरी दुर्गाका ध्यान करके शीघ्र ही त्रिपुरपर प्रहार किया। उसकी चोट खाकर वह दैत्य भूतलपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंने शंकरका स्तवन किया और उनपर पुष्पोंकी वर्षा की। दुर्गाने उन्हें त्रिशूल, विष्णुने पिनाक और ब्रह्माने शुभाशीर्वाद दिया। मुनिगण हर्षमग्न हो गये। सभी देवता हर्षविभोर हो नाचने लगे और गन्धर्व-किन्नर गान करने लगे। तात! इसी अवसरपर अनुपम स्तवराज भी प्रकट हुआ—जो विघ्नों, विघ्नकर्ताओं और शत्रुओंका संहारक, परमैश्वर्यका उत्पादक, सुखद, परम शुभ, निर्वाण-मोक्षका दाता, हरि-भक्तिप्रद, गोलोकका वास प्रदान करनेवाला, सर्वसिद्धिप्रद और श्रेष्ठ है। उस स्तवराजका पाठ करनेसे पार्वती सदा प्रसन्न रहती हैं। वह मनुष्योंके लोभ, मोह, काम, क्रोध और कर्मके मूलका उच्छेदक, बल-बुद्धिकारक, जन्म-मृत्युका विनाशक, धन, पुत्र, स्त्री, भूमि आदि समस्त सम्पत्तियोंका प्रदाता, शोक-दुःखका हरण करनेवाला, सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता तथा सर्वोत्तम है। इस स्तोत्रराजके पाठसे महावन्ध्या भी प्रसविनो हो जाती है, बँधा हुआ बन्धनमुक्त हो जाता है, दुःखी निश्चय ही भयसे छूट जाता है, रोगीका रोग नष्ट हो जाता है, दरिद्र धनी हो जाता है तथा महासागरमें नावके डूब जानेपर एवं दावाग्निके बीच घिर जानेपर भी उस मनुष्यकी मृत्यु नहीं होती। वैश्येन्द्र! इस स्तोत्रके प्रभावसे मनुष्य डाकुओं, शत्रुओं तथा हिंसक जन्तुओंसे घिर जानेपर भी कल्याणका भागी होता है। तात! यदि गोलोककी प्राप्तिके लिये आप नित्य इस स्तोत्रका पाठ करेंगे तो यहाँ ही आपको उन पार्वतीके साक्षात् दर्शन होंगे।


स्त्रीरूपं चातिपुरुषं देवि त्वं च नपुंसकम्। वृक्षाणां वृक्षरूपा त्वं सृष्टा चाङ्कुररूपिणी॥
वह्नौ च दाहिकाशक्तिर्जले शैत्यस्वरूपिणी। सूर्यतेजःस्वरूपा च प्रभारूपा च संततम्॥
गन्धरूपा च भूमौ च आकाशे शब्दरूपिणी। शोभास्वरूपा चन्द्रे च पद्मसंघे च निश्चितम्॥
सृष्टौ सृष्टिरूपा च पालने परिपालिका। महामारी च संहारे जले च जलरूपिणी॥
क्षुत्त्वं दया त्वं निद्रा त्वं तृष्णा त्वं बुद्धिरूपिणी। तुष्टिस्त्वं चापि पुष्टिस्त्वं श्रद्धा त्वं च क्षमा स्वयंम्॥
शान्तिस्त्वं च स्वयं भ्रान्तिःकान्तिस्त्वं कीर्तिरेव च। लज्जा त्वं च तथा माया भुक्तिमुक्तिस्वरूपिणी॥
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं सर्वसम्पत्प्रदायिनी। वेदेऽनिर्वचनीया त्वं त्वां न जानाति कश्चन॥
सहस्रवक्त्रस्त्वां स्तोतुं न च शक्तः सुरेश्वरि। वेदा न शक्ताः को विद्वान् न च शक्ता सरस्वती॥
स्वयं विधाता शक्तो न न च विष्णुः सनातनः। किं स्तौमि पञ्चवक्त्रेण रणत्रस्तो महेश्वरि॥
कृपां कुरु महामाये मम शत्रुक्षयं कुरु। इत्युक्त्वा च सकरुणं रथस्थे पतिते रणे॥
आविर्बभूव सा दुर्गा सूर्यकोटिसमप्रभा। नारायणेन कृपया प्रेरिता परमात्मना॥
शिवस्य पुरतः शीघ्रं शिवाय च जयाय च। इत्युवाच महादेवी मायाशक्त्यासुरं जहि॥
(८८। १५—३८)