ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१३
विप्रेन्द्र! श्रीकृष्णका वचन सुनकर नन्दने इस स्तोत्रद्वारा सम्पूर्ण सम्पत्तियोंको प्रदान करनेवाली पार्वतीका स्तवन किया। मुने! तब दुर्गाने उन्हें गोलोक-वासरूप अभीष्ट वर प्रदान किया। साथ ही जो वेदमें भी नहीं सुना गया है, वह परम दुर्लभ ज्ञान, गोकुलकी राजाधिराजता और परम दुर्लभ श्रीकृष्ण-भक्ति भी दी। इसके अतिरिक्त नन्दको श्रीकृष्णकी दासता, महत्ता और सिद्धता भी प्राप्त हुई। इस प्रकार वरदान देकर और शम्भुके साथ वार्तालाप करके दुर्गाजी अदृश्य हो गयीं। तब देवता और मुनिगण भी नन्दनन्दनकी स्तुति करके अपने-अपने स्थानको चले गये।
[तत्पश्चात् नन्दसे श्रीकृष्णने कहा—] 'नन्दजी! अब आप दुर्लभ ज्ञानसे संयुक्त होनेके कारण मोहका त्याग करके प्रसन्नमनसे ब्रजवासियोंसहित ब्रजको लौट जाइये। ब्रजराज! जाइये, जाइये, घर जाइये, ब्रजको पधारिये। अब आपको सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान हो गया। आपने मुनियों तथा देवताओंके दर्शन कर लिये और मेरे द्वारा अत्यन्त दुर्लभ नाना प्रकारके इतिहास, धनवर्धक आख्यान और जन्म एवं पापका विनाश करनेवाला दुर्गाका स्तोत्रराज भी सुन लिया। जो कुछ सामने उपस्थित था, उसका मैंने आपसे हर्ष और सुखपूर्वक वर्णन कर दिया। मैंने बाल-चपलतावश जो कुछ अपराध किया हो, उसे क्षमा कीजिये। तात! जो सुख मैंने माता-पिताके राजमहलमें नहीं किया, उससे बढ़कर तथा स्वर्गसे भी परम दुर्लभ सुख आपके यहाँ किया है। मेरे प्रिय वचन, नम्रता, विनय, भय, बहुसंख्यक परिहास, यशोदा, गोपिकागण, बालसमूह और विशेषतया राधा—ये सभी एकत्र स्थित हैं। उन बन्धुवर्गोंके साथ कर्मानुसार यहीं सुख भोगकर उत्तम गोलोकको जाओ। तात! यशोदा, रोहिणी, गोपिकागण, गोपबालक, वृषभानु, गोपसमूह, राधाकी माता कलावती और राधाके साथ आप पार्थिव देहको त्यागकर और दिव्य देह धारण करके गोलोक जायँगे। राधा और राधाकी माता कलावतीकी उत्पत्ति योनिसे नहीं हुई है; अतः वह निश्चय ही अपने उसी नित्यदेहसे गोलोकमें जायगी। कलावती पितरोंकी मानसी कन्या है; अतः धन्य और माननीय है। इसी प्रकार सीतामाता, दुर्गामाता, मेनका, दुर्गा, तारा और सुन्दरी सीता—ये सभी अयोनिजा तथा धन्य हैं। वे तथा मेना और कलावती योनिसे न उत्पन्न होनेके कारण धन्यवादकी पात्र हैं। तात! इस प्रकार मैंने परम दुर्लभ गोपनीय आख्यानका वर्णन कर दिया तथा मैंने और दुर्गाने आपको यह वरदान भी दे दिया।' श्रीकृष्णका वचन सुनकर श्रीकृष्णभक्त व्रजेश्वर उन भक्तवत्सल जगदीश्वरसे पुनः बोले।
नन्दने कहा—प्रभो! श्रीकृष्ण! चारों युगोंके जो-जो सनातन धर्म होते हैं, उनका तथा कलियुगकी समाप्तिमें कलिके जो-जो गुण-दोष होते हों और पृथ्वी, धर्म तथा प्राणियोंकी क्या गति होती है—इन सबका क्रमशः विस्तारपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। नन्दकी बात सुनकर कमलनयन श्रीकृष्ण प्रसन्न हो गये, फिर उन्होंने मधुरताभरी विचित्र कथा कहना आरम्भ किया।
(अध्याय ८८-८९)
श्रीकृष्णद्वारा चारों युगोंके धर्मादिका कथन, श्रीकृष्णको गोकुल चलनेके लिये नन्दका आग्रह
श्रीकृष्णने कहा—नन्दजी! पुराणोंमें जैसी अत्यन्त मधुर रमणीय कथा कही गयी है, उसे कहता हूँ। आप प्रसन्नमन होकर उसे श्रवण करें। सत्ययुगमें धर्म, सत्य और दया—ये अपने सभी