भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 727

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ७१७

श्रीकृष्णका उद्धवको गोकुल भेजना, उद्धवका गोकुलमें सत्कार तथा उनका वृन्दावन आदि सभी वनोंकी शोभा देखते हुए राधिकाके पास पहुँचना और राधास्तोत्रद्वारा उनका स्तवन करना

श्रीभगवान्‌ने कहा— तात! कर्मफल-भोगके अनुसार संयोग और उसीसे वियोग भी होता है तथा उसीसे क्षणमात्रमें दर्शन भी प्राप्त हो जाता है। भला, उस कर्मभोगको कौन मिटा सकता है? पिताजी! उद्धव गमनागमनका प्रयोजन बतलायेंगे। मैं उन्हें शीघ्र ही भेजता हूँ। तत्पश्चात् आपको भी सब मालूम हो जायगा। वे गोकुलमें जाकर यशोदा, रोहिणी, गोपिकाओं, ग्वालबालों और उस प्राणप्यारी राधिकाको समझायेंगे—श्रीकृष्ण यों कह ही रहे थे कि वहाँ वसुदेव, देवकी, बलदेव, उद्धव तथा अक्रूर शीघ्र ही आ पहुँचे।

वसुदेवने कहा— नन्दजी! तुम तो बलवान्, ज्ञानी, मेरे सद्बन्धु और सखा हो; अतः मोहको त्याग दो और घरको प्रस्थान करो। यह श्रीकृष्ण जैसे मेरा बच्चा है, उसी तरह तुम्हारा भी है। मित्र! मधुरा नगरी गोकुलसे दूर नहीं है; वह तो उसके दरवाजेके समान है। अतः नन्दजी! सदा आनन्द-महोत्सवके अवसरपर तुम्हें यह पुत्र देखनेको मिलेगा।

श्रीदेवकीने कहा— नन्दजी! यह श्रीकृष्ण जैसे हम दोनोंका पुत्र है; उसी तरह आपका भी है—यह निश्चित है; फिर किसलिये आपका शरीर शोकसे मुरझाया हुआ दीख रहा है? श्रीकृष्ण तो बलदेवके साथ आपके महलमें ग्यारह वर्षोंतक सुखपूर्वक रह चुका है, तब आप थोड़े दिनोंके वियोगसे ही शोकग्रस्त कैसे हो जायँगे? (यदि ऐसी बात है तो) कुछ दिनोंतक मथुरामें ही इस पुत्रके साथ आप रहिये और उसके पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुखका अवलोकन कीजिये तथा अपना जन्म सफल कीजिये।

तब श्रीभगवान् बोले— उद्धव! तुम सुखपूर्वक गोकुल जाओ। भद्र! तुम्हारा कल्याण होगा। तुम हर्षपूर्वक गोकुलमें जाकर मेरे द्वारा दिये गये शोकका विनाश करनेवाले आध्यात्मिक ज्ञानसे माता यशोदा, रोहिणी, ग्वालबाल-समूह, मेरी राधिका और गोपिकाओंको सान्त्वना दो। शोकके कारण नन्दजी मेरी माताकी आज्ञासे अब यहीं रहें। तुम नन्दजीका ठहरना और मेरी विनय यशोदाको बतला देना।—यों कहकर श्रीकृष्ण पिता, माता, बलराम और अक्रूरके साथ तुरंत ही महलके भीतर चले गये। नारद! उद्धव मथुरामें रात बिताकर प्रातःकाल शीघ्र ही रमणीय वृन्दावन नामक वनके लिये प्रस्थित हुए।

श्रीनारायण कहते हैं— नारद! श्रीकृष्णकी प्रेरणासे उद्धव हर्षपूर्वक गणेश्वरको प्रणाम करके नारायण, शम्भु, दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वतीका स्मरण करते हुए मन-ही-मन गङ्गा और उस दिशाके स्वामी महेश्वरका ध्यान करके मङ्गल-सूचक शकुनोंको देखते हुए आगे बढ़े। उन्हें मार्गमें दुन्दुभि और घण्टाका शब्द, शङ्खध्वनि, हरिनाम-संकीर्तन और मङ्गल-ध्वनि सुनायी पड़ी। इस प्रकार वे मार्गमें पति-पुत्रवती साध्वी नारी, प्रज्वलित दीप, माला, दर्पण, जलसे परिपूर्ण घट, दही, लावा, फल, दूर्वाङ्कुर, सफेद धान, चाँदी, सोना, मधु, ब्राह्मणोंका समूह, कृष्णसार मृग, साँड़, घी, गजराज, नरेश्वर, श्वेत रंगका घोड़ा, पताका, नेवला, नीलकण्ठ, श्वेत पुष्प और चन्दन आदि कल्याणमय वस्तुओंको देखते हुए वृन्दावन नामक वनमें जा पहुँचे। वहाँ उन्हें सामने ही भाण्डीर-वट नामक वृक्ष दीख पड़ा; जिसका रंग लाल था तथा जो अविनाशी, कोमल, पुण्यदाता और अभीष्ट तीर्थ है। उसके बाद लाल रंगके गहनोंसे सजे हुए सुन्दर वेषधारी बालकोंको देखा।