ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७१८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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वे बाल-कृष्णका नाम ले-लेकर शोकवश रो रहे थे। उन्हें आश्वासन देकर उद्धव आनन्दपूर्वक नगरमें प्रवेश करके कुछ दूर आगे गये। तब उन्हें वह नन्दभवन दिखायी दिया, जिसे विश्वकर्माने बनाया था। उसका निर्माण मणियों और रत्नोंसे हुआ था। उसमें मोती, माणिक्य और हीरे जड़े हुए थे। वह अमूल्य रत्नोंके बने हुए मनोरम कलशोंसे सुशोभित था। नाना प्रकारकी चित्रकारी दरवाजेकी शोभा बढ़ा रही थी। उसे देखकर उद्धव हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रविष्ट हुए और उसके आँगनमें पहुँचकर तुरंत ही रथसे उतरकर भूतलपर खड़े हो गये। उन्हें देखकर यशोदा और रोहिणीने तुरंत ही उनका कुशल-समाचार पूछा और आनन्दमग्न हो उन्हें आसन, जल, गौ और मधुपर्क निवेदित किया। तदनन्तर वे पूछने लगीं—'उद्धव! नन्दजी कहाँ हैं? तथा बलराम और श्रीकृष्ण कहाँ हैं? वह सब वृत्तान्त ठीक-ठीक बतलाओ।' तब उद्धवने क्रमशः कहना आरम्भ किया—'यशोदे! सुनो, वे सब सर्वथा सकुशल हैं; नन्दजी आनन्दपूर्वक हैं। वे श्रीकृष्ण और बलरामके साथ कुछ विलम्बसे आयेंगे; क्योंकि वहाँ श्रीकृष्णके उपनयन-संस्कारतक ठहरेंगे। मैं विधिपूर्वक तुमलोगोंका कुशल-समाचार जानकर मथुरा लौट जाऊँगा।' इस मङ्गल-समाचारको सुनकर यशोदा और रोहिणी आनन्दविभोर हो गयीं; उन्होंने ब्राह्मणको बुलाकर रत्न, सुवर्ण और उत्तम वस्त्र प्रदान किया। तत्पश्चात् उद्धवको अमृतोपम मिष्टान्न भोजन कराया तथा उन्हें उत्तम मणि, रत्न और हीरे भेंटमें दिये। फिर नाना प्रकारके माङ्गलिक बाजे बजवाये, मङ्गल-कार्य कराया, ब्राह्मणोंको जिमाया और वेदपाठ करवाया। फिर परमानन्दपूर्वक नाना प्रकारके उपहार, नैवेद्य, पुष्प, धूप, दीप, चन्दन, वस्त्र, ताम्बूल, मधु, गो-दुग्ध, दधि और घृत आदि सामग्रियोंसे ब्राह्मणद्वारा सर्वव्यापी भगवान् शंकरका पूजन सम्पन्न किया। मुने! तदनन्तर षोडशोपचारकी सामग्रियों और अनेक प्रकारकी बलिसे श्रीवृन्दावनकी अधिष्ठात्री देवीकी पूजा की और श्रीकृष्णके कल्याणके लिये तुरंत ही ब्राह्मणोंको सौ सूधी भैंसें, एक हजार बकरियाँ, पंद्रह हजार शुद्ध भेड़, सौ मोहरें तथा सौ गायें दक्षिणामें दीं। फिर बारंबार आदरसहित उद्धवका सेवा-सत्कार किया।
तत्पश्चात् उद्धव यशोदा, रोहिणी, ग्वालबालों, वृद्धों और सभी गोपियोंको भलीभाँति आश्वासन देकर रासमण्डल देखनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने रमणीय रासमण्डलको देखा, जो चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार और सैकड़ों केलेके खंभोंसे सुशोभित था। तदनन्तर रासमण्डलकी शोभा, असंख्य गोपी तथा श्रीकृष्ण ही आ गये—इस अनुमानसे असंख्य गोपोंको प्रतीक्षा करते देखा। फिर यमुनाकी प्रदक्षिणा करके उद्धवने चन्दन, चम्पक, यूथिका, केतकी, माधवी, मौलसिरी, अशोक, काञ्चन, कर्णिका आदि वनोंकी प्रदक्षिणा की। फिर आनन्दपूर्ण मनसे नागेश्वर, लवङ्ग, शाल, ताल, हिंताल, पनस, रसाल, मन्दार आदि काननोंको देखते हुए रमणीय कुञ्जवनके दर्शन करके अत्यन्त मधुर रमणीय मधुकाननमें प्रवेश किया। पुनः बदरीवनमें जानेके बाद कदलीवनमें जाकर अति निभृत स्थानमें श्रीराधिकाके आश्रमके दर्शन किये। वहाँकी दिव्य विलक्षण शोभाको देखनेके बाद वे अन्तिम द्वारपर पहुँचे। सखियोंने उनका स्वागत करके उन्हें राधाके पास पहुँचा दिया। उद्धवने आश्चर्यचकित कर देनेवाली राधाको सामने देखा। वे चन्द्रकलाके समान सुन्दरी थीं, उनके नेत्र पूर्णतया खिले हुए कमलके सदृश थे, उन्होंने भूषणोंका त्याग कर दिया था, केवल कानोंमें सुवर्णके रंग-बिरंगे कुण्डल झलमला रहे थे, अत्यन्त क्लेशके कारण उनका मुख लाल हो गया था, वे शोकसे मूर्च्छित हो