भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण आचरण नहीं करते* । क्योंकि वह महान् वैर उत्पन्न करनेवाला, दोषोंका बीज और अमङ्गलकारी होता है। जो अपने धर्मके आचरणमें लगा हुआ है, भगवान्‌के मन्त्रकी दीक्षा ले चुका है, श्रीहरिकी समाराधनामें संलग्न है, गुरु, देवता और अतिथियोंका भक्त है, तपस्यामें आसक्त है, व्रत और उपवासमें लगा रहता है और सदा तीर्थसेवन करता है, उसे देखकर रोग उसी तरह भाग जाते हैं, जैसे गरुड़को देखकर साँप। ऐसे पुरुषोंके पास जरा- अवस्था नहीं जाती है और न दुर्जय रोगसमूह ही उसपर आक्रमण करते हैं। पतिव्रते मालावति ! वात, पित्त और कफ - ये तीन ज्वरके जनक हैं। ये जिस प्रकार देहधारियोंमें संचार करते और स्वयं जाते हैं, उसके विविध कारणों तथा उपायोंको मुझसे सुनो। जब भूखकी आग प्रज्वलित हो रही हो और उस समय आहार न मिले तो प्राणियोंके शरीरमें - मणिपूरक १ चक्रमें पित्तका प्रकोप होता है। ताड़ और बेलका फल खाकर तत्काल जल पी लिया जाय तो वही सद्यः प्राणनाशक पित्त हो जाता है। जो दैवका मारा हुआ पुरुष शरद् ऋतुमें गरम पानी पीता और भादोंमें तिक्त भोजन करता है, उसका पित्त बढ़ जाता है। धनिया पीसकर उसे शक्करके साथ ठंडे जलमें घोल दिया जाय तो उसको पीनेसे पित्तकी शान्ति होती है। चना सब प्रकारका, गव्य पदार्थ, तक्ररहित दही, पके हुए बेल और तालके फल, ईखके रससे बनी हुई सब वस्तुएँ, अदरक, मूँगकी दालका जूस तथा शर्करामिश्रित तिलका चूर्ण - ये सब पित्तका नाश करनेवाली ओषधियाँ हैं, जो तत्काल बल और पुष्टि प्रदान करती हैं। पित्तका कारण और उसके नाशका उपाय बताया गया। अब दूसरी बात मुझसे सुनो। भोजनके बाद तुरंत स्नान करना, बिना प्यासके जल पीना, सारे शरीरमें तिलका तेल मलना, स्निग्ध तैल तथा स्निग्ध आँवलेके द्रवका सेवन, बासी अन्नका भोजन, तक्रपान, केलेका पका हुआ फल, दही, वर्षाका जल, शक्करका शर्बत, अत्यन्त चिकनाईसे युक्त जलका सेवन, नारियलका जल, बासी पानीसे रूखा स्नान (बिना तेल लगाये नहाना), तरबूजके पके फल खाना, ककड़ीके अधिक पके हुए फलका सेवन करना, वर्षा-ऋतुमें तालाबमें नहाना और मूली खाना - इन सबसे कफकी वृद्धि होती है। वह कफ ब्रह्मरन्ध्रमें उत्पन्न होता है, जो महान् वीर्यनाशक माना गया है। गन्धर्वनन्दिनि ! आग तापकर शरीरसे पसीना निकालना, भूजी भाँगका सेवन करना, पकाये हुए तेल-विशेषको काममें लाना, घूमना, सूखे पदार्थ खाना, सूखी पकी हर्रेका सेवन करना, कच्चा पिण्डारक२ (पिण्डारा), कच्चा केला, बेसवार३ (पीसा हुआ जीरा, मिर्च, लौंग आदि

  • पापेन जायते व्याधिः पापेन जायते जरा । पापेन जायते दैन्यं दुःखं शोको भयंकरः ॥ तस्मात् पापं महावैरं दोषबीजममङ्गलम् । भारते संततं सन्तो नाचरन्ति भयातुराः ॥ ( ब्रह्मखण्ड १६ । ५१-५२) १. तन्त्रके अनुसार छः चक्रोंमेंसे तीसरा चक्र, जिसकी स्थिति नाभिके पास मानी जाती है। यह तेजोमय और विद्युत्के समान आभावाला है। इसका रंग नीला है। इसमें दस दल होते हैं और उन दलोंपर 'ड' से लेकर 'फ' तकके अक्षर अंकित हैं। वह चक्र शिवका निवासस्थान माना जाता है। उसपर ध्यान लगानेसे सब विषयोंका ज्ञान हो जाता है। २. एक प्रकारका फल-शाक। ३. एक जड़ीका पौधा । भावप्रकाशके अनुसार यह पौधा हिमालयके शिखरोंपर होता है। इसका कन्द लहसुनके कन्दके समान और इसकी पत्तियाँ महीन सारहीन होती हैं। इसकी टहनियोंमें बारीक काँटे होते हैं और