ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ६७
मसाला), सिन्धुवार (सिन्दुवार या निर्गुण्डी), अनाहार (उपवास), अपानक (पानी न पीना), घृतमिश्रित रोचना-चूर्ण, घी मिलाया हुआ सूखा शक्कर, काली मिर्च, पिप्पल, सूखा अदरक, जीवक (अष्टवर्गान्तर्गत औषधविशेष) तथा मधु—ये द्रव्य तत्काल कफको दूर करनेवाले तथा बल और पुष्टि देनेवाले हैं।
अब वातके प्रकोपका कारण सुनो। भोजनके बाद तुरंत पैदल यात्रा करना, दौड़ना, आग तापना, सदा घूमना और मैथुन करना, वृद्धा स्त्रीके साथ सहवास करना, मनमें निरन्तर संताप रहना, अत्यन्त रूखा खाना, उपवास करना, किसीके साथ जूझना, कलह करना, कटु वचन बोलना, भय और शोकसे अभिभूत होना—ये सब केवल वायुकी उत्पत्तिके कारण हैं। आज्ञा नामक चक्रमें वायुकी उत्पत्ति होती है। अब उसकी ओषधि सुनो। केलेका पका हुआ फल, बिजौरा नीबूके फलके साथ चीनीका शर्बत, नारियलका जल, तुरंतका तैयार किया हुआ तक्र, उत्तम पिट्ठी (पूआ, कचौरी आदि), भैंसका केवल मीठा दही या उसमें शक्कर मिला हो, तुरंतका बासी अन्न, सौवीर (जौकी काँजी), ठंडा पानी, पकाया हुआ तेलविशेष अथवा केवल तिलका तेल, नारियल, ताड़, खजूर, आँवलेका बना हुआ उष्ण द्रव पदार्थ, ठंडे और गरम जलका स्नान, सुस्निग्ध चन्दनका द्रव, चिकने कमलपत्रकी शय्या और स्निग्ध व्यञ्जन—वत्से! ये सब वस्तुएँ तत्काल ही वायुदोषका नाश करनेवाली हैं। मनुष्योंमें तीन प्रकारके वायु-दोष होते हैं। शारीरिक क्लेशजनित, मानसिक संतापजनित और कामजनित। मालावति! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष रोगसमूहका वर्णन किया तथा उन रोगोंके नाशके लिये श्रेष्ठ विद्वानोंने जो नाना प्रकारके तन्त्र बनाये हैं, उनकी भी चर्चा की। वे सभी तन्त्र रोगोंका नाश करनेवाले हैं। उनमें रोगनिवारणके लिये रसायन आदि परम दुर्लभ उपाय बताये गये हैं। साध्वि ! विद्वानोंद्वारा रचे गये उन सब तन्त्रोंका यथावत् वर्णन कोई एक वर्षमें भी नहीं कर सकता। शोभने ! बताओ, तुम्हारे प्राणवल्लभकी मृत्यु किस रोगसे हुई है। मैं उसका उपाय करूँगा, जिससे ये जीवित हो जायँगे।
सौति कहते हैं— ब्राह्मणकी यह बात सुनकर गन्धर्वकुमारी चित्ररथ-पुत्री मालावतीने प्रसन्न होकर इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
मालावती बोली— विप्रवर! सुनिये। सभामें लज्जित हुए मेरे प्रियतमने ब्रह्माजीके शापके कारण योगबलसे प्राणोंका परित्याग किया है। मैंने आपके मुँहसे निकले हुए अपूर्व, शुभ एवं मनोहर आख्यानको पूर्णरूपसे सुना है। इस संसारमें विपत्तिके बिना कब, किसको, कहाँ आप-जैसे महात्माओंका संग प्राप्त हुआ है? विद्वन् ! अब मुझे मेरे प्राणनाथको जीवित करके दे दीजिये। मैं आप सब लोगोंके चरणोंमें नमस्कार करके स्वामीके साथ अपने घरको जाऊँगी।
मालावतीका यह वचन सुनकर ब्राह्मणरूप-धारी भगवान् विष्णु उसके पाससे उठकर शीघ्र ही देवताओंकी सभामें गये।
(अध्याय १६)
दूध निकलता है। यह अष्टवर्ग औषधके अन्तर्गत है और इसका कंद मधुर, बलकारक, कामोद्दीपक होता है। ऋषभ और जीवक दोनों एक ही जातिके गुल्म हैं, भेद केवल इतना ही है कि ऋषभकी आकृति बैलके सींगकी तरह होती है और जीवककी झाडूकी-सी।