ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 78, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
ब्राह्मण-बालकके साथ क्रमशः ब्रह्मा, महादेवजी तथा धर्मकी बातचीत, देवताओंद्वारा श्रीविष्णुकी तथा ब्राह्मणद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी उत्कृष्ट महत्ताका प्रतिपादन
सौति कहते हैं— ब्राह्मणको आया देख देवसमुदाय उठकर खड़ा हो गया था। फिर वहाँ सभामें उन सबकी परस्पर बातचीत हुई। ये ब्राह्मणरूपधारी साक्षात् भगवान् विष्णु हैं, यह बात देवताओंकी समझमें नहीं आयी। भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित होनेके कारण वे पूर्वापरकी सारी बातें भूल गये थे। शौनकजी! उस समय ब्राह्मणने सब देवताओंको सम्बोधित करके मधुर वाणीमें वह सत्य बात कही, जो प्राणियोंके लिये परम कल्याणकारक थी।
ब्राह्मण बोले— देवताओ! यह उपबर्हणकी भार्या और चित्ररथकी कन्या है। पतिशोकसे पीड़ित होकर इसने स्वामीके जीवनदानके लिये याचना की है। अब इस कार्यके लिये निश्चितरूपसे किस उपायका अवलम्बन करना चाहिये? सब देवता मिलकर मुझे वह उपाय बतायें, जो सदा काममें लाने योग्य और समयोचित हो। मालावती श्रेष्ठ सती एवं तेजस्विनी है। वह अपना मनोरथ सफल न होनेपर समस्त देवताओंको शाप देनेके लिये उद्यत है। अतः आपलोगोंके कल्याणके लिये मैं यहाँ आया हूँ और मैंने सतीको समझा-बुझाकर शान्त किया है। सुना है, आपलोगोंने श्वेतद्वीपमें श्रीहरिकी भी स्तुति की थी; परंतु आपलोगोंके वे स्वामी भगवान् विष्णु यहाँ आये कैसे नहीं? आकाशवाणी हुई थी कि तुमलोग चलो, पीछेसे भगवान् विष्णु भी जायँगे। आकाशवाणीकी बात तो अटल होती है; फिर वह विपरीत कैसे हो गयी?
ब्राह्मणकी यह बात सुनकर साक्षात् जगद्गुरु ब्रह्माने यह परम मङ्गलमय सत्य एवं हितकर बात कही।
ब्रह्माजी बोले— मेरे पुत्र नारद ही शापवश उपबर्हण नामक गन्धर्व हुए थे। फिर मेरे ही शापसे उन्होंने योगधारणाद्वारा प्राणोंको त्याग दिया। भूतलपर उपबर्हणकी स्थिति एक लाख युगतक नियत की गयी थी। इसके बाद वे शूद्रयोनिमें पहुँचकर उस शरीरको त्यागनेके बाद फिर मेरे पुत्रके रूपमें प्रतिष्ठित हो जायँगे। भूतलपर उनके रहनेका जो समय नियत था, उसका कुछ भाग अभी शेष है। उसके अनुसार इस समय इनकी आयु अभी एक सहस्र वर्षतक और बाकी है। मैं स्वयं भगवान् विष्णुकी कृपासे उपबर्हणको जीवन-दान दूँगा। जिससे इस देवसमुदायको शापका स्पर्श न हो, वह उपाय मैं अवश्य करूँगा। ब्रह्मन्! आपने जो यह कहा कि यहाँ भगवान् विष्णु क्यों नहीं आये, सो ठीक नहीं है; क्योंकि भगवान् विष्णु तो सर्वत्र विद्यमान हैं। वे ही सबके आत्मा हैं। आत्माका पृथक् शरीर कहाँ होता है? वे स्वेच्छामय परब्रह्म परमात्मा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य शरीर धारण करते हैं। वे सनातनदेव सर्वत्र हैं, सर्वज्ञ हैं और सबको देखते हैं। 'विष्' धातु व्याप्तिवाचक है और 'णु' का अर्थ सर्वत्र है। वे सर्वात्मा श्रीहरि सर्वत्र व्यापक हैं; इसलिये विष्णु कहे गये हैं। कोई अपवित्र हो या पवित्र अथवा किसी भी अवस्थामें क्यों न हो, जो कमलनयन भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह बाहर-भीतरसहित पूर्णतः पवित्र हो जाता है*। ब्रह्मन्! कर्मके
* अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
(ब्रह्मखण्ड १७। १७)