भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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ब्रह्मखण्ड ६९

आरम्भ, मध्य और अन्तमें जो श्रीविष्णुका स्मरण करता है, उसका वैदिक कर्म साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाता है*। जगत्की सृष्टि करनेवाला मैं विधाता, संहारकारी हर तथा कर्मोंके साक्षी धर्म—ये सब जिनकी आज्ञाके परिपालक हैं, जिनके भय और आज्ञासे काल समस्त लोकोंका संहार करता है, यम पापियोंको दण्ड देता है और मृत्यु सबको अपने अधिकारमें कर लेती है। सर्वेश्वरी, सर्वाद्या और सर्वजननी प्रकृति भी जिनके सामने भयभीत रहती तथा जिनकी आज्ञाका पालन करती है। वे भगवान् विष्णु ही सबके आत्मा और सर्वेश्वर हैं।

महेश्वर बोले—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके जो सुप्रसिद्ध पुत्र हैं, उनमेंसे किसके वंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है? वेदोंका अध्ययन करके तुमने कौन-सा सार तत्त्व जाना है? विप्रवर! तुम किस मुनीन्द्रके शिष्य हो? और तुम्हारा नाम क्या है? तुम अभी बालक हो तो भी सूर्यसे बढ़कर तेज धारण करते हो। तुम अपने तेजसे देवताओंको भी तिरस्कृत करते हो; परंतु सबके हृदयमें अन्तर्यामी आत्मरूपसे विराजमान हमारे स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा विष्णुको नहीं जानते हो, यह आश्चर्यकी बात है। उन परमात्माके ही त्याग देनेपर देहधारियोंका यह शरीर गिर जाता है और सभी सूक्ष्म इन्द्रियवर्ग एवं प्राण उसके पीछे उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे उसके सेवक जाते हैं। जीव उन्हींका प्रतिबिम्ब है। वह तथा मन, ज्ञान, चेतना, प्राण, इन्द्रियवर्ग, बुद्धि, मेधा, धृति, स्मृति, निद्रा, दया, तन्द्रा, क्षुधा, तृष्णा, पुष्टि, श्रद्धा, संतुष्टि, इच्छा, क्षमा और लज्जा आदि भाव उन्हींके अनुगामी माने गये हैं। वे परमात्मा जब जानेको उद्यत होते हैं, तब उनकी शक्ति आगे-आगे जाती है। उपर्युक्त सभी भाव तथा शक्ति उन्हीं परमात्माके आज्ञापालक हैं। देहमें जबतक ईश्वरकी स्थिति है, तभीतक देहधारी जीव सब प्रकारके कर्म करनेमें समर्थ होता है। उन ईश्वर (या उनके अंशभूत जीव)-के निकल जानेपर शरीर शव होकर अस्पृश्य एवं त्याज्य हो जाता है। ऐसे सर्वेश्वर शिवको कौन देहधारी नहीं मानता? सबकी सृष्टि करनेवाले साक्षात् जगत्-विधाता ब्रह्मा निरन्तर उन भगवान्के चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं, परंतु उनका दर्शन नहीं कर पाते। ब्रह्माजीने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये जब एक लाख युगोंतक तप किया, तब इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और ये संसारकी सृष्टि करनेमें समर्थ हुए। मैंने भी श्रीहरिकी आराधना करते हुए सुदीर्घ कालतक, जिसकी कोई गणना नहीं है, तप किया; परंतु मेरा मन नहीं भरा। भला, मङ्गलकी प्राप्तिसे कौन तृप्त होता है? अब मैं समस्त कर्मोंसे निःस्पृह हो अपने पाँच मुखोंसे उनके नाम और गुणोंका कीर्तन एवं गान करता हुआ सर्वत्र घूमता रहता हूँ। उनके नाम और गुणोंके कीर्तनका ही यह प्रभाव है कि मृत्यु मुझसे दूर भागती है। निरन्तर भगवन्नामका जप करनेवाले पुरुषको देखकर मृत्यु पलायन कर जाती है। चिरकालतक तपस्यापूर्वक उनके नाम और गुणोंका कीर्तन करनेसे ही मैं समस्त ब्रह्माण्डोंका संहार करनेमें समर्थ एवं मृत्युञ्जय हुआ हूँ। समय आनेपर मैं उन्हीं श्रीहरिमें लीन होता हूँ तथा पुनः उन्हींसे मेरा प्रादुर्भाव होता है। उन्हींकी कृपासे काल मेरा संहार नहीं कर सकता और मौत मुझे मार नहीं सकती। ब्रह्मन्! जो श्रीकृष्ण गोलोकधाममें निवास करते हैं, वे ही वैकुण्ठ और श्वेतद्वीपमें भी हैं। जैसे आग और उसकी चिनगारियोंमें कोई अन्तर नहीं है, उसी प्रकार अंशी और अंशमें भेद नहीं होता। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। (प्रत्येक मन्वन्तरमें दो इन्द्र व्यतीत होते हैं।)


* कर्मारम्भे च मध्ये वा शेषे विष्णुं च यः स्मरेत्। परिपूर्णं तस्य कर्म वैदिकं च भवेद् द्विज॥
(ब्रह्मखण्ड १७।१८)

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