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ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

ब्रह्मखण्ड ६९

आरम्भ, मध्य और अन्तमें जो श्रीविष्णुका स्मरण करता है, उसका वैदिक कर्म साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो जाता है*। जगत्की सृष्टि करनेवाला मैं विधाता, संहारकारी हर तथा कर्मोंके साक्षी धर्म—ये सब जिनकी आज्ञाके परिपालक हैं, जिनके भय और आज्ञासे काल समस्त लोकोंका संहार करता है, यम पापियोंको दण्ड देता है और मृत्यु सबको अपने अधिकारमें कर लेती है। सर्वेश्वरी, सर्वाद्या और सर्वजननी प्रकृति भी जिनके सामने भयभीत रहती तथा जिनकी आज्ञाका पालन करती है। वे भगवान् विष्णु ही सबके आत्मा और सर्वेश्वर हैं।

महेश्वर बोले—ब्रह्मन्! ब्रह्माजीके जो सुप्रसिद्ध पुत्र हैं, उनमेंसे किसके वंशमें तुम्हारा जन्म हुआ है? वेदोंका अध्ययन करके तुमने कौन-सा सार तत्त्व जाना है? विप्रवर! तुम किस मुनीन्द्रके शिष्य हो? और तुम्हारा नाम क्या है? तुम अभी बालक हो तो भी सूर्यसे बढ़कर तेज धारण करते हो। तुम अपने तेजसे देवताओंको भी तिरस्कृत करते हो; परंतु सबके हृदयमें अन्तर्यामी आत्मरूपसे विराजमान हमारे स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा विष्णुको नहीं जानते हो, यह आश्चर्यकी बात है। उन परमात्माके ही त्याग देनेपर देहधारियोंका यह शरीर गिर जाता है और सभी सूक्ष्म इन्द्रियवर्ग एवं प्राण उसके पीछे उसी तरह निकल जाते हैं, जैसे राजाके पीछे उसके सेवक जाते हैं। जीव उन्हींका प्रतिबिम्ब है। वह तथा मन, ज्ञान, चेतना, प्राण, इन्द्रियवर्ग, बुद्धि, मेधा, धृति, स्मृति, निद्रा, दया, तन्द्रा, क्षुधा, तृष्णा, पुष्टि, श्रद्धा, संतुष्टि, इच्छा, क्षमा और लज्जा आदि भाव उन्हींके अनुगामी माने गये हैं। वे परमात्मा जब जानेको उद्यत होते हैं, तब उनकी शक्ति आगे-आगे जाती है। उपर्युक्त सभी भाव तथा शक्ति उन्हीं परमात्माके आज्ञापालक हैं। देहमें जबतक ईश्वरकी स्थिति है, तभीतक देहधारी जीव सब प्रकारके कर्म करनेमें समर्थ होता है। उन ईश्वर (या उनके अंशभूत जीव)-के निकल जानेपर शरीर शव होकर अस्पृश्य एवं त्याज्य हो जाता है। ऐसे सर्वेश्वर शिवको कौन देहधारी नहीं मानता? सबकी सृष्टि करनेवाले साक्षात् जगत्-विधाता ब्रह्मा निरन्तर उन भगवान्के चरणारविन्दोंका चिन्तन करते हैं, परंतु उनका दर्शन नहीं कर पाते। ब्रह्माजीने श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये जब एक लाख युगोंतक तप किया, तब इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और ये संसारकी सृष्टि करनेमें समर्थ हुए। मैंने भी श्रीहरिकी आराधना करते हुए सुदीर्घ कालतक, जिसकी कोई गणना नहीं है, तप किया; परंतु मेरा मन नहीं भरा। भला, मङ्गलकी प्राप्तिसे कौन तृप्त होता है? अब मैं समस्त कर्मोंसे निःस्पृह हो अपने पाँच मुखोंसे उनके नाम और गुणोंका कीर्तन एवं गान करता हुआ सर्वत्र घूमता रहता हूँ। उनके नाम और गुणोंके कीर्तनका ही यह प्रभाव है कि मृत्यु मुझसे दूर भागती है। निरन्तर भगवन्नामका जप करनेवाले पुरुषको देखकर मृत्यु पलायन कर जाती है। चिरकालतक तपस्यापूर्वक उनके नाम और गुणोंका कीर्तन करनेसे ही मैं समस्त ब्रह्माण्डोंका संहार करनेमें समर्थ एवं मृत्युञ्जय हुआ हूँ। समय आनेपर मैं उन्हीं श्रीहरिमें लीन होता हूँ तथा पुनः उन्हींसे मेरा प्रादुर्भाव होता है। उन्हींकी कृपासे काल मेरा संहार नहीं कर सकता और मौत मुझे मार नहीं सकती। ब्रह्मन्! जो श्रीकृष्ण गोलोकधाममें निवास करते हैं, वे ही वैकुण्ठ और श्वेतद्वीपमें भी हैं। जैसे आग और उसकी चिनगारियोंमें कोई अन्तर नहीं है, उसी प्रकार अंशी और अंशमें भेद नहीं होता। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। (प्रत्येक मन्वन्तरमें दो इन्द्र व्यतीत होते हैं।)


* कर्मारम्भे च मध्ये वा शेषे विष्णुं च यः स्मरेत्। परिपूर्णं तस्य कर्म वैदिकं च भवेद् द्विज॥
(ब्रह्मखण्ड १७।१८)

१०- भगवान् शंकरद्वारा बाणासुरके समक्ष संसारपावननामक (शिव) कवचका कथन

७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अट्ठाईसवें* इन्द्रके गत होनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। इसी संख्यासे विशिष्ट सौ वर्षकी आयुवाले ब्रह्माजीका जब पतन होता है, तब परमात्मा विष्णुके नेत्रकी एक पलक गिरती है। मैं परमात्मा श्रीकृष्णकी एक श्रेष्ठ कलामात्र हूँ। अतः उनकी महिमाका पार कौन पा सकता है? मैं तो कुछ भी नहीं जानता।

शौनक! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँ चुप हो गये। तब समस्त कर्मोंके साक्षी धर्मने अपना प्रवचन आरम्भ किया।

धर्म बोले— जिनके हाथ-पैर तथा सबको देखनेवाले नेत्र सर्वत्र विद्यमान हैं; जो सबके अन्तरात्मारूपसे प्रत्यक्ष हैं, तथापि दुरात्मा पुरुष जिन्हें नहीं देख या समझ पाते; उन सर्वव्यापी प्रभुके सब देश, काल और वस्तुओंमें विद्यमान होनेपर भी जो तुमने यह कहा कि ‘अभीतक भगवान् विष्णु इस सभामें नहीं आये’, ऐसा किस बुद्धिसे निश्चय किया? तुम्हारी बात सुनकर मुनियोंको भी मतिभ्रम हो सकता है। जहाँ महापुरुषकी निन्दा होती हो, वहाँ साधु पुरुष उस निन्दाको नहीं सुनते; क्योंकि निन्दक श्रोताओंके साथ ही कुम्भीपाक नरकमें जाता है और वहाँ एक युगतक कष्ट भोगता रहता है। यदि दैववश महापुरुषोंकी निन्दा सुनायी पड़ जाय तो विद्वान् पुरुष श्रीविष्णुका स्मरण करनेपर समस्त पापोंसे मुक्त होता और दुर्लभ पुण्य पाता है। जो इच्छा या अनिच्छासे भी भगवान् विष्णुकी निन्दा करता है तथा जो नराधम सभाके बीचमें बैठकर उस निन्दाको सुनता और हँसता है, वह ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। जहाँ श्रीहरिकी निन्दा होती है, वह स्थान मदिरापात्रकी भाँति अपवित्र माना जाता है। वहाँ जाकर यदि भगवन्निन्दा सुनी गयी तो सुननेवाला प्राणी निश्चय ही नरकमें पड़ता है। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें विष्णु-निन्दाके तीन भेद बताये थे। एक तो वह जो परोक्षमें निन्दा करता है, दूसरा वह जो श्रीहरिको मानता ही नहीं है तथा तीसरी कोटिका निन्दक वह ज्ञानहीन नराधम है, जो दूसरे देवताओंके साथ उनकी तुलना करता है। सौ ब्रह्माओंकी आयुपर्यन्त उस निन्दकका नरकसे उद्धार नहीं होता। जो नराधम गुरु एवं पिताकी निन्दा करता है, वह चन्द्रमा और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरकमें पड़ा रहता है। भगवान् विष्णु तीनों लोकोंमें सबके गुरु, पिता, ज्ञानदाता, पोषक, पालक, भयसे रक्षक तथा वरदाता हैं।

इन तीनोंकी बात सुनकर वे ब्राह्मणशिरोमणि हँसने लगे। फिर उन देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले।

ब्राह्मणने कहा— हे धर्मशाली देवताओ! मैंने भगवान् विष्णुकी क्या निन्दा की है? श्रीहरि यहाँ नहीं आये इसलिये आकाशवाणीकी बात व्यर्थ हो गयी, यही तो मैंने कहा है। देवेश्वरो! धर्मके लिये सच बोलो। जो सभामें बैठकर पक्षपात करते हैं वे अपनी सौ पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं। आपलोग भावुक हैं, बताइये तो सही, यदि विष्णु सदा और सर्वत्र व्यापक हैं तो आपलोग उनसे वर माँगनेके लिये


* विष्णुपुराण प्रथम अंश अध्याय ३ के श्लोक १५ से १७ तक यह बात बतायी गयी है कि 'एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होता है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु तथा मनुपुत्र—ये एक ही कालमें उत्पन्न होते हैं और एक ही कालमें उनका संहार होता है।' इससे सूचित होता है कि चौदहवें इन्द्रके बीतनेपर ब्रह्माका दिन पूरा होता है; परंतु यहाँ २८ वें इन्द्रके गत होनेपर ब्रह्माका एक दिन बताया गया है। इसकी संगति तभी लग सकती है, जब एक मन्वन्तरमें दो इन्द्रकी सृष्टि और संहार माने जायँ। परंतु ऐसा माननेपर अन्य पुराणोंसे एकवाक्यता नहीं होगी।

ब्रह्मखण्ड ७१

श्वेतद्वीपमें क्यों गये थे? अंश और अंशीमें भेद नहीं है तथा आत्मामें भी भेदका अभाव है, यदि यही आपका निश्चित मत है तो बताइये श्रेष्ठ पुरुष कला (अंश)-का त्याग करके पूर्णतम (अंशी)-की उपासना क्यों करते हैं? यद्यपि पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णकी कोटि जन्मोंतक आराधना करके भी उन्हें वशमें कर लेना अत्यन्त कठिन है और असाधु पुरुषोंके लिये तो वे सर्वथा असाध्य हैं, तथापि लोगोंकी बलवती आशा उन्हींकी सेवा करना चाहती है। क्या छोटे और क्या बड़े, सभी परम पदको पाना चाहते हैं। जैसे बौना अपने दोनों हाथोंसे चन्द्रमाको छूना चाहे, उसी तरह लोग उन पूर्णतम परमात्माको हस्तगत करना चाहते हैं। जो विष्णु हैं, वे एक विषय (देश)-में रहते हैं। विश्वके अन्तर्गत श्वेतद्वीपमें निवास करते हैं। आप, ब्रह्मा, महादेव, धर्म तथा दिशाओंके स्वामी दिक्पाल भी एक देशके निवासी हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवेश्वर, देवसमूह और चराचर प्राणी—ये सब भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें अनेक हैं। उन ब्रह्माण्डों और देवताओंकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उन सबके एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण हैं, जो भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये दिव्य विग्रह धारण करते हैं। जिसे सभी पाना चाहते हैं, वह सत्यलोक या नित्य वैकुण्ठधाम समस्त ब्रह्माण्डसे ऊपर है। उससे भी ऊपर गोलोक है, जिसका विस्तार पचास करोड़ योजन है। वैकुण्ठधाममें वे सनातन श्रीहरि चार भुजाधारी लक्ष्मीपतिके रूपमें निवास करते हैं। वहाँ सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उन्हें घेरे रहते हैं। गोलोकमें वे सनातनदेव दो भुजाओंसे युक्त राधावल्लभ श्रीकृष्णरूपसे निवास करते हैं। वहाँ बहुत-सी गोपाङ्गनाएँ, गौएँ तथा द्विभुज गोप-पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। वे गोलोकाधिपति श्रीकृष्ण ही परिपूर्णतम ब्रह्म हैं। वे ही समस्त देहधारियोंके आत्मा हैं। वे सदा स्वेच्छामय रूप धारण करके दिव्य वृन्दावनके अन्तर्गत रासमण्डलमें विहार करते हैं। दिव्य तेजोमण्डल ही उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् हैं। योगी एवं संत-महात्मा सदा उन्हीं निरामय परमात्माका ध्यान करते हैं। नूतन जलधरके समान उनकी श्याम कान्ति है। दो भुजाएँ हैं। श्रीअङ्गोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पाता है। उनका लावण्य करोड़ों कन्दर्पोंसे भी अधिक है। वे लीलाधाम हैं। उनका रूप अत्यन्त मनोहर है। किशोर अवस्था है। वे नित्य शान्त-स्वरूप परमात्मा मुखसे मन्द-मन्द मुस्कानकी आभा बिखेरते रहते हैं। वैष्णव संत उन्हीं सत्यस्वरूप श्यामसुन्दरका सदा भजन और ध्यान करते हैं। आपलोग भी वैष्णव ही हैं और मुझसे पूछ रहे हैं कि 'तुम्हारा जन्म किसके वंशमें हुआ है? तथा तुम किस मुनीन्द्रके शिष्य हो?' ऐसा प्रश्न मुझसे बार-बार किया गया है। देवताओ! मैं जिसके वंशमें उत्पन्न हूँ और जिसका बालक-शिष्य हूँ, उन्हींका यह ज्ञानमय वचन है। तुमलोग इसे सुनो और समझो। देवेश्वर सुरेश! गन्धर्वको शीघ्र जीवित करो। विचार व्यक्त करनेपर स्वतः ज्ञात हो जाता है कि कौन मूर्ख है और कौन विद्वान् ? अतः यहाँ वाग्युद्धका क्या प्रयोजन है?

शौनक ! ऐसा कहकर वे ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु चुप हो गये और जोर-जोरसे हँसने लगे।

(अध्याय १७)

७२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा उपबर्हणको जीवित करनेकी चेष्टा, मालावतीद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन, शक्तिसहित भगवान्का गन्धर्वके शरीरमें प्रवेश तथा गन्धर्वका जी उठना, मालावतीद्वारा दान एवं मङ्गलाचार तथा पूर्वोक्त स्तोत्रके पाठकी महिमा

**सौति कहते हैं—**भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित हुए ब्रह्मा और शिव आदि देवता ब्राह्मणके साथ मालावतीके निकट गये। ब्रह्माजीने शवके शरीरपर कमण्डलुका जल छिड़क दिया और उसमें मनका संचार करके उसके शरीरको सुन्दर बना दिया। फिर ज्ञानानन्दस्वरूप साक्षात् शिवने उसे ज्ञान प्रदान किया। स्वयं धर्मने धर्म-ज्ञान और ब्राह्मणने जीव-दान दिया। अग्निकी दृष्टि पड़ते ही गन्धर्वके शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हो गया। फिर कामकी दृष्टि पड़नेसे वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो गया। जगत्के प्राणस्वरूप वायुका अधिष्ठान होनेसे उस शरीरके भीतर निःश्वास और प्राणोंका संचार होने लगा। फिर सूर्यके अधिष्ठित होनेसे गन्धर्वके नेत्रोंमें देखनेकी शक्ति आ गयी। वाणीकी दृष्टि पड़नेसे वाक्शक्ति और श्रीके दृष्टिपातसे शोभा प्रकट हुई। इतनेपर भी वह शव नहीं उठा। जडकी भाँति सोता ही रहा। आत्माका अधिष्ठान प्राप्त न होनेसे उसे विशिष्ट बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। तब ब्रह्माजीके कहनेसे मालावतीने शीघ्र ही नदीके जलमें स्नान किया और दो धुले वस्त्र धारण करके उस सतीने परमेश्वरकी स्तुति प्रारम्भ की।

**मालावती बोली—**मैं समस्त कारणोंके भी कारणरूप उन परमात्माकी वन्दना करती हूँ, जिनके बिना भूतलके सभी प्राणी शवके समान हैं। वे निर्लिप्त हैं। सबके साक्षी हैं। समस्त कर्मोंमें सर्वत्र और सर्वदा विद्यमान हैं तो भी सबकी दृष्टि (जानकारी)-में नहीं आते हैं। जिन्होंने सबकी आधारभूता उस परात्परा प्रकृतिकी सृष्टि की है; जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी भी जननी तथा त्रिगुणमयी है; साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा जिनकी सेवामें नियमित रूपसे लगे रहते हैं; पालक विष्णु और साक्षात् जगत्संहारक शिव भी जिनकी सेवामें निरन्तर तत्पर रहते हैं; सब देवता, मुनि, मनु, सिद्ध, योगी और संत-महात्मा सदा प्रकृतिसे परे विद्यमान जिन परमेश्वरका ध्यान करते हैं; जो साकार और निराकार भी हैं; स्वेच्छामय रूपधारी और सर्वव्यापी हैं। वर, वरेण्य, वरदायक, वर देनेके योग्य और वरदानके कारण हैं, तपस्याके फल, बीज और फलदाता हैं; स्वयं तपःस्वरूप तथा सर्वरूप हैं; सबके आधार, सबके कारण, सम्पूर्ण कर्म, उन कर्मोंके फल और उन फलोंके दाता हैं तथा जो कर्मबीजका नाश करनेवाले हैं, उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करती हूँ। वे स्वयं तेजःस्वरूप होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं; क्योंकि विग्रहके बिना भक्तजन किसकी सेवा और किसका ध्यान करेंगे। विग्रहके अभावमें भक्तोंसे सेवा और ध्यान बन ही नहीं सकते। तेजका महान् मण्डल ही उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्योंके समान दीप्तिमान् हैं। उनका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर है। नूतन मेघकी-सी श्याम कान्ति, शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान नेत्र, शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मन्द मुस्कानकी छटासे सुशोभित मुख और करोड़ों कन्दर्पोंको भी तिरस्कृत करनेवाला लावण्य उनकी सहज विशेषताएँ हैं। वे मनोहर लीलाधाम हैं। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दो बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, हाथमें मुरली है, श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर शोभा पाता है, किशोर अवस्था है। वे शान्तस्वरूप राधाकान्त अनन्त आनन्दसे परिपूर्ण हैं। कभी निर्जन वनमें गोपाङ्गनाओंसे घिरे रहते हैं। कभी रासमण्डलमें विराजमान हो राधा-

२०- गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन

ब्रह्मखण्ड ७३

रानीसे समाराधित होते हैं। कभी गोप-बालकोंसे घिरे हुए गोपवेषसे सुशोभित होते हैं। कभी सैकड़ों शिखरवाले गिरिराज गोवर्धनके कारण उत्कृष्ट शोभासे युक्त रमणीय वृन्दावनमें कामधेनुओंके समुदायको चराते हुए बालगोपालके रूपमें देखे जाते हैं। कभी गोलोकमें विरजाके तटपर पारिजातवनमें मधुर-मधुर वेणु बजाकर गोपाङ्गनाओंको मोहित किया करते हैं। कभी निरामय वैकुण्ठधाममें चतुर्भुज लक्ष्मीकान्तके रूपमें रहकर चार भुजाधारी पार्षदोंसे सेवित होते हैं। कभी तीनों लोकोंके पालनके लिये अपने अंशरूपसे श्वेतद्वीपमें विष्णुरूप धारण करके रहते हैं और पद्मा उनकी सेवा करती हैं। कभी किसी ब्रह्माण्डमें अपनी अंशकलाद्वारा ब्रह्मारूपसे विराजमान होते हैं। कभी अपने ही अंशसे कल्याणदायक मङ्गलरूप शिव-विग्रह धारण करके शिवधाममें निवास करते हैं। अपने सोलहवें अंशसे स्वयं ही सर्वाधार, परात्पर एवं महान् विराट्-रूप धारण करते हैं, जिनके रोम-रोममें अनन्त ब्रह्माण्डोंका समुदाय शोभा पाता है। कभी अपनी ही अंशकलाद्वारा जगत्की रक्षाके लिये लीलापूर्वक नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं। उन अवतारोंके वे स्वयं ही सनातन बीज हैं। कभी योगियों एवं संत-महात्माओंके हृदयमें निवास करते हैं। वे ही प्राणियोंके प्राणस्वरूप परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। मैं मूढ़ अबला उन निर्गुण एवं सर्वव्यापी भगवान्‌की स्तुति करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। वे अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणीसे परे हैं। भगवान् अनन्त सहस्र मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति नहीं कर सकते। पञ्चमुख महादेव, चतुर्मुख ब्रह्मा, गजानन गणेश और षडानन कार्तिकेय भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, माया भी जिनकी मायासे मोहित रहती है, लक्ष्मी भी जिनकी स्तुति करनेमें सफल नहीं होती, सरस्वती भी जडवत् हो जाती है और वेद भी जिनका स्तवन करनेमें अपनी शक्ति खो बैठते हैं, उन परमात्माका स्तवन दूसरा कौन विद्वान् कर सकता है? मैं शोकातुर अबला उन निरीह परात्पर परमेश्वरकी स्तुति क्या कर सकती हूँ।*


*मालावत्युवाच

वन्दे तं परमात्मानं सर्वकारणकारणम् । विना येन शवाः सर्वे प्राणिनो जगतीतले ॥
निर्लिप्तं साक्षिरूपं च सर्वेषां सर्वकर्मसु । विद्यमानं न दृष्टं च सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ॥
येन सृष्टा च प्रकृतिः सर्वाधारा परात्परा । ब्रह्मविष्णुशिवादीनां प्रसूर्या त्रिगुणात्मिका ॥
जगत्स्रष्टा स्वयं ब्रह्मा नियतो यस्य सेवया । पाता विष्णुश्च जगतां संहर्ता शंकरः स्वयम् ॥
ध्यायन्ते यं सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा । सिद्धाश्च योगिनः सन्तः सन्ततं प्रकृतेः परम् ॥
साकारं च निराकारं परं स्वेच्छामयं विभुम् । वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम् ॥
तपःफलं तपोबीजं तपसां च फलप्रदम् । स्वयं तपःस्वरूपं च सर्वरूपं च सर्वतः ॥
सर्वाधारं सर्वबीजं कर्म तत्कर्मणां फलम् । तेषां च फलदातारं तद्बीजं क्षयकारणम् ॥
स्वयं तेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् । सेवाध्यानं न घटते भक्तानां विग्रहं विना ॥
तत्तेजो मण्डलाकारं सूर्यकोटिसमप्रभम् । अतीव कमनीयं च रूपं तत्र मनोहरम् ॥
नवीननीरदश्यामं शरत्पङ्कजलोचनम् । शरत्पार्वणचन्द्रास्यमीषद्विकास्यसमन्वितम् ॥
कोटिकन्दर्पलावण्यं लीलाधाम मनोहरम् । चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं रत्नभूषणभूषितम् ॥
द्विभुजं मुरलीहस्तं पीतकौशेयवाससम् । किशोरवयसं शान्तं राधाकान्तमनन्तकम् ॥
गोपाङ्गनापरिवृतं कुत्रचिन्निर्जने वने । कुत्रचिद्रासमध्यस्थं राधया परिसेवितम् ॥
कुत्रचिद् गोपवेशं च वेष्टितं गोपबालकैः । शतशृङ्गाचलोत्कृष्टे रम्ये वृन्दावने वने ॥
निकरं कामधेनूनां रक्षन्तं शिशुरूपिणम् । गोलोके विरजातीरे पारिजातवने वने ॥
वेणुं क्वणन्तं मधुरं गोपीसम्मोहकारणम् । निरामये च वैकुण्ठे कुत्रचिच्च चतुर्भुजम् ॥

७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ऐसा कहकर गन्धर्व-कुमारी मालावती चुप हो गयी और फूट-फूटकर रोने लगी। भयसे पीड़ित हुई उस सतीने कृपानिधान भगवान् श्रीकृष्णको बारंबार प्रणाम किया। तब निराकार परमात्मा भगवान् श्रीकृष्ण अपनी शक्तियोंके साथ मालावतीके पति—गन्धर्व उपबर्हणके शरीरमें अधिष्ठित हुए। उनका आवेश होते ही गन्धर्व वीणा लिये उठ बैठा और शीघ्र ही स्नानके पश्चात् दो नवीन वस्त्र धारण करके उसने देव-समूहको तथा सामने खड़े हुए उन ब्राह्मणदेवताको प्रणाम किया। फिर तो देवता दुन्दुभि बजाने और फूलोंकी वर्षा करने लगे। उन गन्धर्व-दम्पतिपर दृष्टिपात करके उन सबने उत्तम आशीर्वाद दिये। गन्धर्वने एक क्षणतक देवताओंके सामने नृत्य और गान किया। देवताओंके वरसे नया जीवन पाकर गन्धर्व उपबर्हण अपनी पत्नीके साथ पुनः गन्धर्व-नगरमें चला गया। सती मालावतीने ब्राह्मणोंको करोड़ों रत्न और नाना प्रकारके धन दिये तथा उन सबको भोजन कराया। उनसे वेदपाठ और मङ्गलकृत्य करवाये। भाँति-भाँतिके बड़े-बड़े उत्सव रचाये। उन सबमें एकमात्र हरिनामकीर्तनरूप मङ्गलकृत्यकी प्रधानता रही। देवता अपने-अपने स्थानको चले गये और ब्राह्मण-रूपधारी साक्षात् श्रीहरि भी अपने धामको पधारे। शौनक! यह सब प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। साथ ही स्तवराजका भी वर्णन किया। जो वैष्णव पुरुष पूजाकालमें इस पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह श्रीहरिकी भक्ति एवं उनके दास्यका सौभाग्य पा लेता है। जो आस्तिक पुरुष वर-प्राप्तिकी कामना रखकर उत्तम आस्था और भक्तिभावसे इस स्तोत्रको पढ़ता है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-सम्बन्धी फलको निश्चय ही पाता है। इस स्तोत्रके पाठसे विद्यार्थीको विद्याका, धनार्थीको धनका, भार्याकी इच्छावालेको भार्याका और पुत्रकी कामनावालेको पुत्रका लाभ होता है। धर्म चाहनेवाला धर्म और यशकी इच्छावाला यश पाता है। जिसका राज्य छिन गया है, वह राज्य और जिसकी संतान नष्ट हो गयी है, वह संतान पाता है। रोगी रोगसे और कैदी बन्धनसे मुक्त हो


लक्ष्मीकान्तं पार्षदैश्च सेवितं च चतुर्भुजैः । कुत्रचित् स्वांशरूपेण जगतां पालनाय च॥
श्वेतद्वीपे विष्णुरूपं पद्माया परिसेवितम् । कुत्रचित् स्वांशकलया ब्रह्माण्डे ब्रह्मरूपिणम्॥
शिवस्वरूपं शिवदं स्वांशेन शिवरूपिणम् । स्वात्मनः षोडशांशेन सर्वाधारं परात्परम्॥
स्वयं महद्विराड्रूपं विश्वौघं यस्य लोमसु । लीलया स्वांशकलया जगतां पालनाय च॥
नानावतारं विभ्रन्तं बीजं तेषां सनातनम् । वसन्तं कुत्रचित् सन्तं योगिनां हृदये सताम्॥
प्राणरूपं प्राणिनां च परमात्मानमीश्वरम् । तं च स्तोतुमशक्ताहमबला निर्गुणं विभुम्॥
निर्लक्ष्यं च निरीहं च सारं वाङ्मनसोः परम् । यं स्तोतुमक्षमोऽनन्तः सहस्रवदनेन च॥
पञ्चवक्त्रश्चतुर्वक्त्रो गजवक्त्रः षडाननः । यं स्तोतुं न क्षमा माया मोहिता यस्य मायया॥
यं स्तोतुं न क्षमा श्रीश्च जडीभूता सरस्वती । वेदा न शक्ता यं स्तोतुं को वा विद्वांश्च वेदवित्॥
किं स्तौमि तमनीहं च शोकार्ता स्त्री परात्परम्। (ब्रह्मखण्ड १८। ९—३४ १/२ )

ब्रह्मखण्ड ७५

जाता है। भयभीत पुरुष भयसे छुटकारा पा जाता है। जिसका धन नष्ट हो गया है, उसे धनकी प्राप्ति होती है। जो विशाल वनमें डाकुओं अथवा हिंसक जन्तुओंसे घिर गया है, दावानलसे दग्ध होनेकी स्थितिमें आ गया है अथवा जलके समुद्रमें डूब रहा है, वह भी इस स्तोत्रका पाठ करके विपत्तिसे छुटकारा पा जाता है।

(अध्याय १८)


ब्रह्माण्डपावन नामक कृष्णकवच, संसारपावन नामक शिवकवच और शिवस्तवराजका वर्णन तथा इन सबकी महिमा

**सौति कहते हैं—**मालावती ब्राह्मणोंको धन देकर बहुत प्रसन्न हुई। उसने स्वामीकी सेवाके लिये नाना प्रकारसे अपना शृङ्गार किया। वह प्रतिदिन पतिकी सेवा-शुश्रूषा और समयोचित पूजा करने लगी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस पतिव्रताने स्वयं एकान्तमें पतिको भूले हुए महापुरुषके स्तोत्र, पूजन, कवच और मन्त्रका बोध कराया। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें गन्धर्व और मालावतीको इस श्रीहरिके स्तोत्र, पूजन आदिका तथा एक मन्त्रका उपदेश दिया था। इसी तरह शंकरजीका स्तोत्र और कवच भी गन्धर्वको भूल गया था। कृपानिधान वसिष्ठने एकान्तमें गन्धर्वराजको उसका भी बोध कराया।

इस प्रकार बोधसम्पन्न हो परमानन्दमय गन्धर्वने अपने कुबेरभवनसदृश आश्रममें रहकर बन्धु-बान्धवोंके साथ राज्य किया। उपबर्हणकी अन्य स्त्रियाँ भी जैसे-तैसे वहाँ आयीं और आकर उन्होंने बड़े आनन्दके साथ पुनः अपने स्वामीको प्राप्त किया।

**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! पूर्वकालमें वसिष्ठजीने उन दोनों दम्पतिको भगवान् विष्णुके किस स्तोत्र, कवच, मन्त्र और पूजा-विधिका उपदेश किया था—यह आप बतानेकी कृपा करें। पूर्वकालमें वसिष्ठजीने गन्धर्वराजको भगवान् शिवके जिस द्वादशाक्षर-मन्त्र और कवच आदिका उपदेश दिया था, वह भी मुझे बताइये। यह सब सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है; क्योंकि शंकरका स्तोत्र, कवच और मन्त्र दुर्गतिका नाश करनेवाला है।

**सौति बोले—**शौनकजी! मालतीने जिस स्तोत्रके द्वारा परमेश्वर श्रीकृष्णका स्तवन किया था, वही स्तोत्र वसिष्ठजीने उन गन्धर्व-दम्पतिको दिया था। अब उनके दिये हुए मन्त्र और कवचका वर्णन सुनिये।

'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा'

—यह षोडशाक्षर-मन्त्र उपासकोंके लिये कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसीका उपदेश वसिष्ठजीने दिया था। पूर्वकालमें श्रीहरिके पुष्करधाममें ब्रह्माजीने कुमारको यह मन्त्र दिया था तथा श्रीकृष्णने गोलोकमें भगवान् शंकरको इसका ज्ञान

११- एक हजार वर्षतक बिना कुछ खाये-पीये कठोर तपस्यामें तत्पर बालक नारदद्वारा ध्यानमें एक दिव्यलोकमें रत्नमय सिंहासनपर आसीन दिव्य बालक—नित्य नवकिशोरका दर्शन

७६संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

प्रदान किया था। यहाँ भगवान् विष्णुके वेदवर्णित स्वरूपका ध्यान किया जाता है, जो सनातन एवं सबके लिये परम दुर्लभ है। पूर्वोक्त मूल मन्त्रसे उत्तम नैवेद्य आदि सभी उपचार समर्पित करने चाहिये। भगवान्‌का जो कवच है, वह अत्यन्त गुप्त है। उसे मैंने अपने पिताजीके मुखसे सुना था। विप्रवर! पूर्वकालमें त्रिशूलधारी भगवान् शंकरने ही पिताजीको गङ्गाके तटपर इसका उपदेश दिया था। भगवान् शंकरको, ब्रह्माजीको तथा धर्मको गोलोकके रासमण्डलमें गोपीवल्लभ श्रीकृष्णने कृपापूर्वक यह परम अद्भुत कवच प्रदान किया था।

ब्रह्मोवाच
राधाकान्त महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
ब्रह्माण्डपावनं नाम कृपया कथय प्रभो॥ १७॥
मां महेशं च धर्मं च भक्तं च भक्तवत्सल।
त्वत्प्रसादेन पुत्रेभ्यो दास्यामि भक्तिसंयुतः॥ १८॥
ब्रह्माजी बोले—महाभाग! राधाकान्त! प्रभो! ब्रह्माण्डपावन नामक जो कवच आपने प्रकाशित किया है, उसका उपदेश कृपापूर्वक मुझको, महादेवजीको तथा धर्मको दीजिये। भक्तवत्सल! हम तीनों आपके भक्त हैं। आपकी कृपासे मैं अपने पुत्रोंको भक्तिपूर्वक इसका उपदेश दूँगा॥ १७-१८॥

श्रीकृष्ण उवाच
शृणु वक्ष्यामि ब्रह्मोश धर्मेदं कवचं परम्।
अहं दास्यामि युष्मभ्यं गोपनीयं सुदुर्लभम्॥ १९॥
यस्मै कस्मै न दातव्यं प्राणतुल्यं ममैव हि।
यत्तेजो मम देहेऽस्ति तत्तेजः कवचेऽपि च॥ २०॥
श्रीकृष्णने कहा—ब्रह्मन्! महेश्वर! और धर्म! तुमलोग सुनो! मैं इस उत्तम कवचका वर्णन कर रहा हूँ। यद्यपि यह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें इसका उपदेश दूँगा। परंतु ध्यान रहे, जिस-किसीको भी इसका उपदेश नहीं देना चाहिये; क्योंकि यह मेरे लिये प्राणोंके समान है। जो तेज मेरे शरीरमें है, वही इस कवचमें भी है॥ १९-२०॥

कुरु सृष्टिमिमं धृत्वा धाता त्रिजगतां भव।
संहर्त्ता भव हे शम्भो मम तुल्यो भवे भव॥ २१॥
हे धर्म त्वमिमं धृत्वा भव साक्षी च कर्मणाम्।
तपसां फलदाता च यूयं भवत मद्गरात्॥ २२॥
ब्रह्मन्! तुम इस कवचको धारण करके सृष्टि करो और तीनों लोकोंके विधाताके पदपर प्रतिष्ठित रहो। शम्भो! तुम भी इस कवचको ग्रहण करके संहारका कार्य सम्पन्न करो और संसारमें मेरे समान शक्तिशाली हो जाओ। धर्म! तुम इस कवचको धारण करके कर्मोंके साक्षी बने रहो। तुम सब लोग मेरे वरसे तपस्याके फलदाता हो जाओ॥ २१-२२॥

ब्रह्माण्डपावनस्यास्य कवचस्य हरिः स्वयम्।
ऋषिश्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं जगदीश्वरः॥ २३॥
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः।
त्रिलक्षवारपठनात् सिद्धिदं कवचं विधे॥ २४॥
इस ब्रह्माण्डपावन कवचके स्वयं श्रीहरि ऋषि हैं, गायत्री छन्द हैं, मैं जगदीश्वर श्रीकृष्ण ही देवता हूँ तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग* कहा गया है। विधे! तीन लाख बार पाठ करनेपर यह कवच सिद्धिदायक होता है॥ २३-२४॥

यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेत्तु सः।
तेजसा सिद्धियोगेन ज्ञानेन विक्रमेण च॥ २५॥
प्रणवो मे शिरः पातु नमो रासेश्वराय च।
भालं पायान्नेत्रयुग्मं नमो राधेश्वराय च॥ २६॥
कृष्णः पायाच्छ्रोत्रयुग्मं हे हरे घ्राणमेव च।
जिह्विकां वह्निजाया तु कृष्णायेति च सर्वतः॥ २७॥


* इस कवचका विनियोगवाक्य संस्कृतमें इस प्रकार है—
ॐ अस्य श्रीब्रह्माण्डपावनकवचस्य साक्षात् श्रीहरिः ऋषिः, गायत्री छन्दः, स एव जगदीश्वरः श्रीकृष्णो देवता धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः।

२१- ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति

ब्रह्मखण्ड ७७

श्रीकृष्णाय स्वाहेति च कण्ठं पातु षडक्षरः।
ह्रीं कृष्णाय नमो वक्त्रं क्लीं पूर्वश्च भुजद्वयम्॥ २८॥
नमो गोपाङ्गनेशाय स्कन्धावष्टाक्षरोऽवतु।
दन्तपंक्तिमोष्ठयुग्मं नमो गोपीश्वराय च॥ २९॥
ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा।
स्वयं वक्षःस्थलं पातु मन्त्रोऽयं षोडशाक्षरः॥ ३०॥
ऐं कृष्णाय स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु।
ॐ विष्णवे स्वाहेति च कङ्कालं सर्वतोऽवतु॥ ३१॥
ॐ हरये नम इति पृष्ठं पादं सदाऽवतु।
ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा सर्वशरीरकम्॥ ३२॥
प्राच्यां मां पातु श्रीकृष्ण आग्नेय्यां पातु माधवः।
दक्षिणे पातु गोपीशो नैर्ऋत्यां नन्दनन्दनः॥ ३३॥
वारुण्यां पातु गोविन्दो वायव्यां राधिकेश्वरः।
उत्तरे पातु राशेश ऐशान्यामच्युतः स्वयम्॥ ३४॥
सन्ततं सर्वतः पातु परो नारायणः स्वयम्।
इति ते कथितं ब्रह्मन् कवचं परमाद्भुतम्॥ ३५॥
मम जीवनतुल्यं च युष्मभ्यं दत्तमेव च।

जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोंके योग, ज्ञान और बल-पराक्रममें मेरे समान हो जाता है।

प्रणव (ओंकार) मेरे मस्तककी रक्षा करे, 'नमो रासेश्वराय' (रासेश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र मेरे ललाटका पालन करे। 'नमो राधेश्वराय' (राधापतिको नमस्कार है) यह मन्त्र दोनों नेत्रोंकी रक्षा करे। 'कृष्ण' दोनों कानोंका पालन करें। 'हे हरे' यह नासिकाकी रक्षा करे। 'स्वाहा' मन्त्र जिह्वाको कष्टसे बचावे। 'कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सब ओरसे हमारी रक्षा करे। 'श्रीकृष्णाय स्वाहा' यह षडक्षर-मन्त्र कण्ठको कष्टसे बचावे। 'ह्रीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र मुखकी तथा 'क्लीं कृष्णाय नमः' यह मन्त्र दोनों भुजाओंकी रक्षा करे। 'नमो गोपाङ्गनेशाय' (गोपाङ्गनावल्लभ श्रीकृष्णको नमस्कार है) यह अष्टाक्षर-मन्त्र दोनों कंधोंका पालन करे। 'नमो गोपीश्वराय' (गोपीश्वरको नमस्कार है) यह मन्त्र दन्तपंक्ति तथा ओष्ठयुगलकी रक्षा करे। 'ॐ नमो भगवते रासमण्डलेशाय स्वाहा' (रासमण्डलके स्वामी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है। उनकी प्रसन्नताके लिये मैं अपने सर्वस्वकी आहुति देता हूँ—त्याग करता हूँ) यह षोडशाक्षर-मन्त्र मेरे वक्षःस्थलकी रक्षा करे। 'ऐं कृष्णाय स्वाहा' यह मन्त्र सदा मेरे दोनों कानोंको कष्टसे बचावे। 'ॐ विष्णवे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे कङ्गाल (अस्थिपञ्जर)-की सब ओरसे रक्षा करे। 'ॐ हरये नमः' यह मन्त्र सदा मेरे पृष्ठभाग और पैरोंका पालन करे। 'ॐ गोवर्द्धनधारिणे स्वाहा' यह मन्त्र मेरे सम्पूर्ण शरीरकी रक्षा करे। पूर्व दिशामें श्रीकृष्ण, अग्निकोणमें माधव, दक्षिण दिशामें गोपीश्वर तथा नैर्ऋत्यकोणमें नन्दनन्दन मेरी रक्षा करें। पश्चिम दिशामें गोविन्द, वायव्यकोणमें राधिकेश्वर, उत्तर दिशामें रासेश्वर और ईशानकोणमें स्वयं अच्युत मेरा संरक्षण करें तथा परमपुरुष साक्षात् नारायण सदा सब ओरसे मेरा पालन करें। ब्रह्मन्! इस प्रकार इस परम अद्भुत कवचका मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया। यह मेरे जीवनके तुल्य है। यह मैंने तुमलोगोंको अर्पित किया॥ २५—३५ १/२॥

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।
कलां नार्हन्ति तान्येव कवचस्यैव धारणात्॥ ३६॥
गुरुमभ्यर्च्य विधिवद्वस्त्रालङ्कारचन्दनैः।
स्नात्वा तं च नमस्कृत्य कवचं धारयेत् सुधीः॥ ३७॥
कवचस्य प्रसादेन जीवन्मुक्तो भवेन्नरः।
यदि स्यात् सिद्धकवचो विष्णुरेव भवेद् द्विज॥ ३८॥

इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे ब्रह्मखण्डे महापुरुषब्रह्माण्डपावनं नाम श्रीकृष्णकवचं सम्पूर्णम्।

इस कवचको धारण करनेसे जो पुण्य होता है, सहस्रों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय-यज्ञ उसकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं हो सकते। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि स्नान करके वस्त्र-अलङ्कार और चन्दनद्वारा विधिवत् गुरुकी पूजा और वन्दना करनेके पश्चात् कवच धारण

७८संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

करे। इस कवचके प्रसादसे मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। शौनकजी! यदि किसीने इस कवचको सिद्ध कर लिया तो वह विष्णुरूप ही हो जाता है॥ ३६—३८॥

इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्त महापुराणके ब्रह्मखण्डमें महापुरुषब्रह्माण्डपावन नामक श्रीकृष्णकवच पूरा हुआ।

सौति कहते हैं— शौनक! अब शिवका कवच और स्तोत्र सुनिये, जिसे वसिष्ठजीने गन्धर्वको दिया था। शिवका जो द्वादशाक्षर-मन्त्र है, वह इस प्रकार है, 'ॐ नमो भगवते शिवाय स्वाहा'। प्रभो! इस मन्त्रको पूर्वकालमें वसिष्ठजीने पुष्करतीर्थमें कृपापूर्वक प्रदान किया था। प्राचीन कालमें ब्रह्माजीने रावणको यह मन्त्र दिया था और शंकरजीने पहले कभी बाणासुरको और दुर्वासाको भी इसका उपदेश दिया था। इस मूलमन्त्रसे इष्टदेवको नैवेद्य आदि सम्पूर्ण उत्तम उपचार समर्पित करना चाहिये। इस मन्त्रका वेदोक्त ध्यान 'ध्यायेन्नित्यं$^१$ महेशं' इत्यादि श्लोकके अनुसार है, जो सर्वसम्मत है।

'ॐ नमो महादेवाय'

बाणासुर उवाच
महेश्वर महाभाग कवचं यत् प्रकाशितम्।
संसारपावनं नाम कृपया कथय प्रभो॥ ४३॥

सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीमहादेवजीको नमस्कार है।

बाणासुरने कहा— महेश्वर! महाभाग! प्रभो! आपने संसारपावन नामक जो कवच प्रकाशित किया है, उसे कृपापूर्वक मुझसे कहिये॥ ४३॥

महेश्वर उवाच
शृणु वक्ष्यामि हे वत्स! कवचं परमाद्भुतम्।
अहं तुभ्यं प्रदास्यामि गोपनीयं सुदुर्लभम्॥ ४४॥

पुरा दुर्वाससे दत्तं त्रैलोक्यविजयाय च।
ममैवेदं च कवचं भक्त्या यो धारयेत् सुधीः॥ ४५॥
जेतुं शक्नोति त्रैलोक्यं भगवानिव लीलया॥ ४६॥

महेश्वर बोले— बेटा! सुनो, उस परम अद्भुत कवचका मैं वर्णन करता हूँ। यद्यपि वह परम दुर्लभ और गोपनीय है तथापि तुम्हें उसका उपदेश दूँगा। पूर्वकालमें त्रैलोक्य-विजयके लिये वह कवच मैंने दुर्वासाको दिया था। जो उत्तम बुद्धिवाला पुरुष भक्तिभावसे मेरे इस कवचको धारण करता है, वह भगवान्‌की भाँति लीलापूर्वक


१. ध्यायेन्नित्यं महेशं' इत्यादि श्लोक इस प्रकार है—
ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं दिव्याकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
रत्नासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववन्द्यं सकलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥
'प्रतिदिन महेश्वरका ध्यान करे। उनकी अङ्गकान्ति चाँदीके पर्वत अथवा कैलासके समान है, मस्तकपर मनोहर चन्द्रमाका मुकुट शोभा पाता है, दिव्य वेश-भूषा एवं शृङ्गारसे उनका प्रत्येक अङ्ग उज्ज्वल—जगमगाता हुआ जान पड़ता है, उनके एक हाथमें फरसा, दूसरेमें मृगछौना तथा शेष दो हाथोंपर अभयकी मुद्राएँ हैं, वे सदा प्रसन्न रहते हैं, रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं, देवता लोग चारों ओरसे खड़े होकर उनकी स्तुति करते हैं। वे बाघम्बर पहने बैठे हैं, सम्पूर्ण विश्वके आदिकारण और वन्दनीय हैं, सबका भय दूर कर देनेवाले हैं, उनके पाँच मुख हैं और प्रत्येक मुखमें तीन-तीन नेत्र हैं।

ब्रह्मखण्ड ७९


तीनों लोकोंपर विजय पा सकता है।
संसारपावनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्च्छन्दश्च गायत्री देवोऽहं च महेश्वरः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ४७ ॥
पञ्चलक्षजपेनैव सिद्धिदं कवचं भवेत् ॥ ४८ ॥
यो भवेत् सिद्धकवचो मम तुल्यो भवेद् भुवि।
तेजसा सिद्धियोगेन तपसा विक्रमेण च ॥ ४९ ॥
शम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः।
दन्तपंक्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम् ॥ ५० ॥
कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषभवाहनः।
वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः ॥ ५१ ॥
सर्वाङ्गं पातु विश्वेशः सर्वदिक्षु च सर्वदा।
स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मां पातु संततम् ॥ ५२ ॥
इति ते कथितं बाण कवचं परमाद्भुतम्।
यस्मै कस्मै न दातव्यं गोपनीयं प्रयत्नतः ॥ ५३ ॥
यत् फलं सर्वतीर्थानां स्नानेन लभते नरः।
तत् फलं लभते नूनं कवचस्यैव धारणात् ॥ ५४ ॥
इदं कवचमज्ञात्वा भजेन्मां यः सुमन्दधीः।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ५५ ॥
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते संसारपावनं नाम शङ्करकवचं सम्पूर्णम्।

इस संसारपावन नामक शिवकवचके प्रजापति ऋषि, गायत्री छन्द तथा मैं महेश्वर देवता हूँ। धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्षके लिये इसका विनियोग है। (विनियोग-वाक्य यों समझना चाहिये—'ॐ अस्य श्रीसंसारपावननामधेयस्य शिवकवचस्य प्रजापतिर्ऋषिर्गायत्री छन्दो महेश्वरो देवता धर्मार्थकाममोक्षसिद्धौ विनियोगः।') पाँच लाख बार पाठ करनेसे यह कवच सिद्धिदायक होता है। जो इस कवचको सिद्ध कर लेता है, वह तेज, सिद्धियोग, तपस्या और बल-पराक्रममें इस भूतलपर मेरे समान हो जाता है ॥ ४७—४९ ॥

शम्भु मेरे मस्तककी और महेश्वर मुखकी रक्षा करें। नीलकण्ठ दाँतोंकी पाँतका और स्वयं हर अधरोष्ठका पालन करें। चन्द्रचूड कण्ठकी और वृषभवाहन दोनों कंधोंकी रक्षा करें। नीलकण्ठ वक्षःस्थलका और दिगम्बर पृष्ठभागका पालन करें। विश्वेश सदा सब दिशाओंमें सम्पूर्ण अङ्गोंकी रक्षा करें। सोते और जागते समय स्थाणुदेव निरन्तर मेरा पालन करते रहें ॥ ५०—५२ ॥

बाण! इस प्रकार मैंने तुमसे इस परम अद्भुत कवचका वर्णन किया। इसका उपदेश जो ही आवे, उसीको नहीं देना चाहिये, अपितु प्रयत्नपूर्वक इसको गुप्त रखना चाहिये। मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नान करके जिस फलको पाता है, उसको अवश्य इस कवचको धारण करनेमात्रसे पा लेता है। जो अत्यन्त मन्दबुद्धि मानव इस कवचको जाने बिना मेरा भजन करता है, वह सौ लाख बार जप करे तो भी उसका मन्त्र सिद्धिदायक नहीं होता ॥ ५३—५५ ॥

इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणमें संसारपावन नामक कवच पूरा हुआ।

सौति कहते हैं—शौनक! यह तो कवच कहा गया। अब स्तोत्र सुनिये। मन्त्रराज कल्पवृक्ष-स्वरूप है। इसे पूर्वकालमें वसिष्ठजीने दिया था।

ॐ नमः शिवाय
बाणासुर उवाच
वन्दे सुराणां सारं च सुरेशं नीललोहितम्।
योगीश्वरं योगबीजं योगिनां च गुरोर्गुरुम् ॥ ५६ ॥
ज्ञानानन्दं ज्ञानरूपं ज्ञानबीजं सनातनम्।
तपसां फलदातारं दातारं सर्वसम्पदाम् ॥ ५७ ॥
तपोरूपं तपोबीजं तपोधनधनं वरम्।
वरं वरेण्यं वरदमीड्यं सिद्धगणैर्वरैः ॥ ५८ ॥
कारणं भुक्तिमुक्तीनां नरकार्णवतारणम्।
आशुतोषं प्रसन्नास्यं करुणामयसागरम् ॥ ५९ ॥
हिमचन्दनकुन्देन्दुकुमुदाम्भोजसंनिभम् ।
ब्रह्मज्योतिःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् ॥ ६० ॥
विषयाणां विभेदेन विभ्रतं बहुरूपकम्।
जलरूपमग्निरूपमाकाशरूपमीश्वरम् ॥ ६१ ॥
वायुरूपं चन्द्ररूपं सूर्यरूपं महत्प्रभुम्।
आत्मनः स्वपदं दातुं समर्थमवलीलया ॥ ६२ ॥

२२- ब्रह्माजीसे सृष्टिके लिये दारपरिग्रहकी प्रेरणा पाकर डरे हुए नारदका स्त्री-संग्रहके दोष बताकर तपके लिये जानेकी आज्ञा माँगना

८० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भक्तजीवनमीशं च भक्तानुग्रहकातरम्।
वेदा न शक्ता यं स्तोतुं किमहं स्तोमि तं प्रभुम्॥ ६३ ॥
अपरिच्छिन्नमीशानमहो वाङ्मनसोः परम्।
व्याघ्रचर्माम्बरधरं वृषभस्थं दिगम्बरम्।
त्रिशूलपट्टिशधरं सस्मितं चन्द्रशेखरम्॥ ६४ ॥
इत्युक्त्वा स्तवराजेन नित्यं बाणः सुसंयतः।
प्रणामच्छंकरं भक्त्या दुर्वासाश्च मुनीश्वरः॥ ६५ ॥

सच्चिदानन्दस्वरूप शिवको नमस्कार है।

बाणासुर बोला— जो देवताओंके सार-तत्त्वस्वरूप और समस्त देवगणोंके स्वामी हैं, जिनका वर्ण नील और लोहित है, जो योगियोंके ईश्वर, योगके बीज तथा योगियोंके गुरुके भी गुरु हैं, उन भगवान् शिवकी मैं वन्दना करता हूँ। जो ज्ञानानन्दस्वरूप, ज्ञानरूप, ज्ञानबीज, सनातन देवता, तपस्याके फलदाता तथा सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो तपःस्वरूप, तपस्याके बीज, तपोधनोंके श्रेष्ठ धन, वर, वरणीय, वरदायक तथा श्रेष्ठ सिद्धगणोंके द्वारा स्तवन करने-योग्य हैं, उन भगवान् शंकरको मैं नमस्कार करता हूँ। जो भोग और मोक्षके कारण, नरकसमुद्रसे पार उतारनेवाले, शीघ्र प्रसन्न होनेवाले, प्रसन्नमुख तथा करुणासागर हैं, उन भगवान् शिवको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनकी अङ्गकान्ति हिम, चन्दन, कुन्द, चन्द्रमा, कुमुद तथा श्वेत कमलके सदृश उज्ज्वल है, जो ब्रह्मज्योतिःस्वरूप तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये विभिन्न रूप धारण करनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो विषयोंके भेदसे बहुतेरे रूप धारण करते हैं, जल, अग्नि, आकाश, वायु, चन्द्रमा और सूर्य जिनके स्वरूप हैं, जो ईश्वर एवं महात्माओंके प्रभु हैं और लीलापूर्वक अपना पद देनेकी शक्ति रखते हैं, जो भक्तोंके जीवन हैं तथा भक्तोंपर कृपा करनेके लिये कातर हो उठते हैं, उन ईश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। वेद भी जिनका स्तवन करनेमें असमर्थ हैं, जो देश, काल और वस्तुसे परिच्छिन्न नहीं हैं तथा मन और वाणीकी पहुँचसे परे हैं, उन परमेश्वर प्रभुकी मैं क्या स्तुति करूँगा! जो बाघम्बरधारी अथवा दिगम्बर हैं, बैलपर सवार हो त्रिशूल और पट्टिश धारण करते हैं, उन मन्द मुसकानकी आभासे सुशोभित मुखवाले भगवान् चन्द्रशेखरको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ५६–६४॥

यों कहकर बाणासुर प्रतिदिन संयमपूर्वक रहकर स्तवराजसे भगवान्‌की स्तुति करता था और भक्तिभावसे शंकरजीके चरणोंमें मस्तक झुकाता था। मुनीश्वर दुर्वासा भी ऐसा ही करते थे॥ ६५॥

मुने! वसिष्ठजीने पूर्वकालमें त्रिशूलधारी शिवके इस परम महान् अद्भुत स्तोत्रका गन्धर्वको उपदेश दिया था। जो मनुष्य भक्तिभावसे इस परम पुण्यमय स्तोत्रका पाठ करता है, वह निश्चय ही सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका फल पा लेता है। जो संयमपूर्वक हविष्य खाकर रहते हुए जगद्गुरु शंकरको प्रणाम करके एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुनता है, वह पुत्रहीन हो तो अवश्य ही पुत्र प्राप्त कर लेता है। जिसको गलित कोढ़का रोग हो या उदरमें बड़ा भारी शूल उठता हो, वह यदि एक वर्षतक इस स्तोत्रको सुने तो अवश्य ही उस रोगसे मुक्त हो जाता है। यह बात मैंने व्यासजीके मुँहसे सुनी है। जो कैदमें पड़कर शान्ति न पाता हो, वह भी एक मासतक इस स्तोत्रको श्रवण करके अवश्य ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है। जिसका राज्य छिन गया हो, ऐसा पुरुष यदि भक्तिपूर्वक एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करे तो अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। एक मासतक संयमपूर्वक इसका श्रवण करके निर्धन मनुष्य धन पा लेता है। राजयक्ष्मासे ग्रस्त होनेपर जो आस्तिक पुरुष एक वर्षतक इसका श्रवण करता है, वह भगवान् शंकरके प्रसादसे निश्चय ही रोगमुक्त हो

नारदका पिताकी आज्ञा ले शिवलोकको जाना

ब्रह्मखण्ड
८१


जाता है। द्विज शौनक! जो सदा भक्तिभावसे इस स्तवराजको सुनता है उसके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। भारतवर्षमें उसको कभी अपने बन्धुओंसे वियोगका दुःख नहीं होता। वह अविचल एवं महान् ऐश्वर्यका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो पूर्ण संयमसे रहकर अत्यन्त भक्तिभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह यदि भार्याहीन हो तो अति विनयशील सती-साध्वी सुन्दरी भार्या पाता है। जो महान् मूर्ख और खोटी बुद्धिका है, ऐसा मनुष्य यदि इस स्तोत्रको एक मासतक सुनता है तो वह गुरुके उपदेशमात्रसे बुद्धि और विद्या पाता है। जो प्रारब्ध-कर्मसे दुःखी और दरिद्र मनुष्य भक्तिभावसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे निश्चय ही भगवान् शंकरकी कृपासे धन प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय इस उत्तम स्तोत्रको सुनता है, वह इस लोकमें सुख भोगता, परम दुर्लभ कीर्ति प्राप्त करता और नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें भगवान् शंकरके धामको जाता है, वहाँ श्रेष्ठ पार्षद होकर भगवान् शिवकी सेवा करता है।
(अध्याय १९)


गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन

**सौति कहते हैं—**उपबर्हण गन्धर्व अपनी पत्नी मालावतीके साथ तथा अन्य पत्नियोंके साथ भी निर्जन वनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे। उन्होंने अपनी आयुका शेष काल सानन्द बिताना आरम्भ किया। उपबर्हणके पिता गन्धर्वराज भी स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके श्रेष्ठ कर्म तथा बड़े-बड़े पुण्य कर्म किये। वे कुबेर-भवनके समान वैभवशाली गृहमें राजा होकर राजसुखका उपभोग करने लगे। उन्होंने अपनी सुस्थिरयौवना सुशीला पत्नीके साथ कुछ कालतक विहार किया। फिर समय आनेपर गङ्गाजीके मनोहर तटपर पत्नीसहित गन्धर्वराज प्राणोंका परित्याग करके सानन्द वैकुण्ठधामको चले गये। वे शैव थे, इसलिये उनपर शिवजीकी कृपा हुई तथा उनके पुत्रने श्रीविष्णुकी सेवा की थी, इसलिये भगवान् विष्णुकी भी उनपर कृपादृष्टि हुई। इससे वे वैकुण्ठमें श्रीविष्णुके श्याम-चतुर्भुजरूपधारी पार्षद हुए। माता-पिताका संस्कार करके गन्धर्व उपबर्हणने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन दिये। शौनकजी! फिर अन्तकाल आनेपर ब्रह्माजीके शापसे प्राणोंका परित्याग करके उस विद्वान् गन्धर्वने ब्राह्मणके वीर्य और शूद्राके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। सती मालावतीने मनमें उत्तम संकल्प ले भारतभूमिके पुष्कर तीर्थमें अग्निकुण्डके भीतर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वह साध्वी मनुवंशी राजा सृंजयकी पत्नीसे उत्पन्न हुई। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रहता था। उस सुन्दरीके मनमें यही संकल्प था कि उपबर्हण गन्धर्व मेरे पति हों।

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! उपबर्हण गन्धर्व ब्राह्मणके वीर्य और शूद्र-पत्नीके गर्भसे किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह आप बतानेकी कृपा करें।

शौनकजीके यों पूछनेपर सूतजीने 'गोपराज द्रुमिलकी पत्नी कलावतीने मुनिवर काश्यपके स्खलित शुक्रको ग्रहण कर लिया था, इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति हुई थी'—इस प्रकार

१३- ब्रह्माजीका नारदको गृहस्थ-धर्मका महत्त्व बताते हुए उन्हें मनुवंशी सृञ्जयके घरमें उत्पन्न रत्नमाला (पूर्वजन्मकी पत्नी मालती)-से विवाह करनेके लिये राजी करना

८२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

उपबर्हणके जन्मकी कथा सुनाकर कहा कि गोपराज बदरिकाश्रममें जाकर योगबलसे शरीरको त्यागनेके पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठधाममें चले गये। तत्पश्चात् शोकविह्वला कलावतीको अपनी माता कहकर एक दयालु ब्राह्मण अपने घर ले गये। साध्वी कलावतीने ब्राह्मणके ही घरमें रहकर एक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया, जिसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान दमक रही थी। वह ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहा था। उस घरमें रहनेवाली सभी स्त्रियोंने उस सुन्दर बालकको देखा। वह अपने ब्रह्मतेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड सूर्यकी प्रभाको पराजित कर रहा था। उसका रूप कामदेवसे भी अधिक सुन्दर तथा मुख चन्द्रमासे भी अधिक मनोहर था। उसके मुखकी शोभासे शरत्पूर्णिमाका चन्द्र लज्जित हो रहा था। उसके नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। ललित हाथ-पैर, सुन्दर कपोल और मनोहर आकृति थी। पद्म और चक्रसे चिह्नित उसके चरणारविन्द अनुपम परम उज्ज्वल प्रतीत होते थे। उसके दोनों हाथोंकी भी कहीं तुलना नहीं थी। वह स्तन पीनेके लिये रो रहा था। स्त्रियाँ उस बालकको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने आश्रमको गयीं। पुत्र और स्त्रीसहित ब्राह्मण भी बड़े प्रसन्न हुए और नृत्य करने लगे। वह बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित कलावतीका पुत्रीकी भाँति पालन करने लगा।

सौति कहते हैं— शौनकजी! समयके अनुसार क्रमशः बढ़ता हुआ वह बालक पाँच वर्षका हो गया। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वह सदा ज्ञानसे सम्पन्न रहता था। उसे पूर्वजन्ममें जपे हुए मन्त्रका सदा स्मरण बना रहा। अतः वह निरन्तर श्रीकृष्णके नाम, यश और गुण आदिका गान किया करता था। क्षणभरमें रोने लगता और दूसरे ही क्षण नृत्य करते हुए उसका सारा शरीर रोमाञ्चित हो उठता था। वह बालक जहाँ-जहाँ श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली गाथा तथा तत्सम्बन्धी पुराण सुनता, वहीं ठहरता था। उसके सारे अङ्ग धूलसे धूसरित रहते थे। वह धूलमें भगवान्‌की प्रतिमा बनाकर धूलसे ही श्रीहरिका पूजन करता और धूलका ही अभीष्ट नैवेद्य अर्पित करता था। मुने! यदि माता सबेरे कलेवेके लिये बेटेको बुलाती तो वह माताको यही उत्तर देता था कि ‘मैं श्रीहरिका पूजन करता हूँ।’

शौनकने पूछा— सूतनन्दन! इस बालकका इस नये जन्ममें क्या नाम हुआ? संज्ञा और व्युत्पत्तिके साथ आप उसे बतानेकी कृपा करें।

सौतिने कहा— शौनकजी! अनावृष्टिके अन्तमें वह बालक उत्पन्न हुआ था। अतः जन्मकालमें जगत्‌को नार (जल) प्रदान किया। इसीसे उसका नाम ‘नारद’ हुआ। पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाला वह महाज्ञानी बालक दूसरे बालकोंको नार अर्थात् ज्ञान देता था, इसलिये भी नारद नामसे विख्यात हुआ। मुने! वह मुनीन्द्र नारदसे ही उत्पन्न हुआ था, इस कारण भी उसका नाम नारद रखा गया।

शौनकजीने पूछा— शिशुका जो नारद नाम रखा गया था, वह तो व्युत्पत्तिके अनुसार उचित जान पड़ा। परंतु उसके उत्पादक मुनीन्द्रका मङ्गलमय नाम नारद किस प्रकार हुआ?

सौतिने कहा— शौनकजी! धर्मपुत्र मुनिवर नरने पुत्रहीन ब्राह्मण कश्यपको पुत्र प्रदान किया था, अतः नरप्रदत्त होनेके कारण उसका नाम नारद हुआ।

शौनक बोले— सूतनन्दन! अब मैंने शिशुके भी नारद नामकी व्युत्पत्ति सुन ली। अब यह बताइये कि शूद्रयोनिमें तथा ब्रह्मपुत्र-अवस्थामें उनका नाम नारद कैसे सम्भव हुआ?

सौतिने कहा— कल्पान्तरमें ब्रह्माजीके कण्ठसे

२४- नारदजीको भगवान् शिवका दर्शन, शिवद्वारा नारदजीका सत्कार तथा उनकी मनोवाञ्छापूर्तिके लिये आश्वासन

ब्रह्मखण्ड ८३

बहुसंख्यक नर उत्पन्न हुए थे। उनके कण्ठने नरका दान किया था, इसलिये वह 'नरद' कहलाया। उस नरद अर्थात् कण्ठसे बालककी उत्पत्ति हुई, इसलिये ब्रह्माजीने उसका मङ्गलमय नाम नारद रखा। अब आप सावधान होकर उस शिशुका वृत्तान्त सुनिये। बालकके नारद नामकी उपलब्धिमें क्या रहस्य है, इस बातकी जानकारी होनेसे कौन-सा विशिष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। वह गोपीका बालक ब्राह्मणके घरमें प्रतिदिन बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित उस गोपीका अपनी पुत्रीकी भाँति पालन करते थे, इसी बीचमें कुछ महातेजस्वी ब्राह्मण, जो देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंकी भाँति जान पड़ते थे, उस ब्राह्मणके घर आये। वे अपने तेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत कर रहे थे। गृहस्थ ब्राह्मणने मधुपर्क आदि देकर उन सबको प्रणाम किया। भोजनके समय उन चारों मुनिवरोंने ब्राह्मणके दिये हुए फल-मूल आदिका आहार ग्रहण किया। उनकी जूठन उस शिशुने खायी। उनमें जो चौथे मुनि थे, उन्होंने उस बालकको प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश दिया। ब्राह्मण और अपनी माताकी आज्ञासे वह बालक उन चारों महात्माओंका दास बनकर उनकी सेवा-टहल करता रहा। एक दिन उस शिशुकी माता रातके समय मार्गपर चल रही थी। इतनेहीमें एक साँपने उसे डँस लिया और वह श्रीहरिका स्मरण करती हुई तत्काल चल बसी। वह सती साध्वी गोपी उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित वैष्णव विमानपर बैठकर विष्णु-पार्षदोंके साथ उसी क्षण वैकुण्ठधाममें जा पहुँची। प्रातः-काल वह बालक उन ब्राह्मणोंके साथ गृहस्थ ब्राह्मणके घरसे चल दिया। उन कृपालु ब्राह्मणोंने उस बालकको तत्त्वज्ञान प्रदान किया। इसके बाद वे सब ब्रह्मकुमार उस शिशुको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। वह शिशु बड़ा ज्ञानी था। अतः गङ्गाजीके मनोहर तटपर ठहर गया। वहाँ स्नान करके उसने ब्राह्मणोंके दिये हुए विष्णु-मन्त्रका जप किया, जो क्षुधा, पिपासा, रोग तथा शोकको हर लेनेवाला है और वेदोंमें भी दुर्लभ है। घोर विशाल वनमें पीपलके नीचे योगासन लगाकर वह बालक वहाँ सुदीर्घकालतक बैठा रहा।

**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! उस बालकको किस मन्त्रकी प्राप्ति हुई? बुद्धिमान् सनत्कुमारके दिये हुए श्रीहरिके उस उत्तम मन्त्रको आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

**सौति बोले—**शौनकजी! पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णने गोलोक-धामके भीतर ब्रह्माजीको कृपापूर्वक जिस बाईस अक्षरवाले मन्त्रका उपदेश दिया था, वह वेदोंमें भी परम दुर्लभ है। ब्रह्माजीने बुद्धिमान् सनत्कुमारको उनके भक्तिभावसे प्रभावित होकर वह मन्त्र दिया तथा सनत्कुमारने उक्त गोपी-बालकको उस मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ श्रीं नमो भगवते रासमण्डलेश्वराय श्रीकृष्णाय स्वाहा।

—यह मन्त्र कल्पवृक्षस्वरूप है। इसके साथ ही महापुरुषस्तोत्र तथा पूर्वोक्त कवच भी दिया। इस मन्त्रके लिये उपयोगी जो सामवेदोक्त ध्यान है, उसका भी उपदेश कर दिया। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तेजोमण्डलस्वरूप जो अनिर्वचनीय चिन्मय प्रकाश है, उसमें ध्यान लगाकर योगी, सिद्धगण तथा देवता मनोवाञ्छित रूपका साक्षात्कार करते हैं। वैष्णवजन उस ज्योतिःपुञ्जके भीतर अपने निकट ही जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह अत्यन्त कमनीय, अनिर्वचनीय एवं मनोहर है। नूतन जलधरके समान उसकी श्याम कान्ति है। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल पङ्कजकी शोभाको छीने लेते हैं। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है। अधर कटे हुए बिम्बफलसे भी अधिक अरुण है। मोतियोंकी पंक्तिको तिरस्कृत

२५- ब्राह्मणोंके आह्निक आचार तथा भगवान्‌के पूजनकी विधिका वर्णन

८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


करनेवाली दन्तावलीके कारण वे बड़े मनोहर जान पड़ते हैं। उनके मुखपर मुस्कराहट खेलती रहती है। उनके हाथमें मुरली शोभा पाती है। श्रीअङ्गोंमें करोड़ों कामदेवोंका लावण्य संचित है। वे लीलाके मनोहर धाम हैं। लाखों चन्द्रमाओंकी प्रभा उनके श्रीविग्रहकी सेवा करती है। उनका प्रत्येक अङ्ग परिपुष्ट तथा श्रीसम्पन्न है। वे त्रिभंगी छबिसे सुशोभित होते हैं, उनके दो बाँहें हैं। शरीरपर पीताम्बर शोभा पाता है। रत्नोंके बने हुए बाजूबंद और कंगन तथा रत्ननिर्मित नूपुर उनके विभिन्न अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। दोनों कपोलोंपर रत्नमय कुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। मस्तकपर मोरपंखका मुकुट शोभा पाता है। रत्नमयी माला कण्ठदेशको विभूषित करती है। मालतीकी वनमालासे घुटनोंतकका भाग सुशोभित है। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं तथा वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले हैं। श्रेष्ठ कौस्तुभमणिकी प्रभासे उनका वक्षःस्थल उद्भासित होता है। सुस्थिर यौवनसे युक्त तथा सदा सब ओर घेरकर खड़ी हुई भूषण-भूषित गोपिकाएँ सदा बाँकी चितवनसे उनकी ओर देखा करती हैं। वे श्रीराधाके वक्षःस्थलमें विराजमान हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता नित्य-निरन्तर उनकी पूजा, वन्दना और स्तुति करते हैं। उनकी अवस्था किशोर है। वे श्रीराधाके प्राणनाथ, शान्तस्वरूप एवं परात्पर हैं। वे निर्लिप्त एवं साक्षीरूप हैं। निर्गुण तथा प्रकृतिसे परे हैं। वे सर्वेश्वर परमात्मा एवं ऐश्वर्यशाली हैं। इस प्रकार उन भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करे।

मुने! इस प्रकार मैंने तुमसे भगवान्‌के ध्यान, स्तोत्र, कवच तथा मन्त्रोपयोगी सत्यका वर्णन किया है। उनका मन्त्र भी कल्पवृक्षस्वरूप है। शौनक! उस समय वह बालक एक हजार दिव्य वर्षोंतक बिना कुछ खाये-पीये ध्यानमें बैठा रहा। उसका पेट सटकर अत्यन्त कृश हो गया था। फिर भी वह सिद्ध मन्त्रके प्रभावसे परिपुष्ट एवं शक्तिमान् था। उसने ध्यानमें देखा—एक दिव्य लोक है, जहाँ रत्नमय सिंहासनपर एक दिव्य बालक विराजमान है। रत्नमय आभूषण उसके अङ्गोंकी शोभा बढ़ाते हैं। किशोर-अवस्था, श्याम-कान्ति, गोप-वेष और मुखपर मन्द-मन्द मुस्कान है। वह पीताम्बरधारी द्विभुज किशोर गोपों और गोपाङ्गनाओंसे घिरा हुआ है। उसके हाथमें मुरली है। चन्दनसे उसके श्रीअङ्गोंका शृङ्गार किया गया है तथा ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता उस चिर-शान्त परात्पर पुरुषकी स्तुति कर रहे हैं।

वह शान्त स्वभाववाला गोपिका बालक श्यामसुन्दरकी उस मनोहर झाँकीको देखकर ध्यानसे विरत हो गया। ध्यान टूटनेपर जब फिर वह उनका दर्शन न कर सका तब शोकसे पीड़ित हो गया। ध्यानगत बालकको पुनः न देखनेपर वह गोपीकुमार पीपलकी जड़पर बैठकर रोने लगा। तब उस रोते हुए बालकको सम्बोधित करके आकाशवाणी हुई। आकाशवाणीका कथन सत्य, प्रबोधयुक्त, हितकर एवं संक्षिप्त था। आकाशवाणी बोली—‘बालक! एक बार जो रूप तेरे दृष्टिपथमें आ चुका है, वही इस समय पर्याप्त

ब्रह्मखण्ड ८५


है। अब फिर तुझे उसका दर्शन नहीं हो सकता; क्योंकि जिनके अन्तःकरणकी वासना परिपक्व नहीं हुई है, ऐसे कुयोगियोंको उस स्वरूपका दर्शन होना अत्यन्त कठिन है। तेरे इस शरीरका अन्त होनेपर जब तुझे दिव्य शरीर प्राप्त होगा, तब तू पुनः जन्म, मृत्यु और जराका नाश करनेवाले गोविन्दका दर्शन करेगा।'

यह सुनकर वह बालक बड़ी प्रसन्नताके साथ पुनः ध्यानके प्रयाससे विरत हो गया। उसने समय आनेपर मन-ही-मन श्रीकृष्णका स्मरण करते हुए तीर्थभूमिमें अपने शरीरको त्याग दिया। उस समय स्वर्गलोकमें दुन्दुभियाँ बजने लगीं। आकाशसे पृथ्वीपर फूलोंकी वर्षा होने लगी। इस प्रकार महामुनि नारद शापमुक्त हो गये। गोप-शरीरका त्याग करके वह जीव ब्रह्म-विग्रहमें विलीन हो गया। वह नित्यस्वरूप तो है ही, पूर्वकालमें उसका आविर्भाव हुआ और भिन्न कालमें वह तिरोहित हो गया। नित्यरूपधारी जो भक्तजन हैं, उनका अपनी इच्छासे आविर्भाव अथवा तिरोभाव होता है। उन्हें जन्म, मृत्यु, जरा और व्याधिका स्पर्श नहीं होता।

(अध्याय २०-२१)


ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति

सौति कहते हैं— शौनकजी ! तदनन्तर कुछ कल्प व्यतीत होनेपर जब ब्रह्माजी पुनः सृष्टि-कार्यमें संलग्न हुए, तब उनके 'नरद' नामक कण्ठदेशसे मरीचि आदि मुनियोंके साथ वे शापमुक्त मुनि प्रकट हुए। इसी कारणसे उन मुनीन्द्रकी 'नारद' नामसे ख्याति हुई। ब्रह्माजीका जो पुत्र उनके चेतस् (चित्त)-से प्रकट हुआ, उसका नाम उन्होंने 'प्रचेता' रखा। जो उनके दक्षिण पार्श्वसे सहसा उत्पन्न हुआ, वह सब कर्मोंमें दक्ष होनेके कारण 'दक्ष' कहलाया। वेदोंमें कर्दम शब्द छायाके अर्थमें विद्यमान है। जो बालक ब्रह्माजीके कर्दम अर्थात् छायासे प्रकट हुआ, उसका नाम 'कर्दम' रखा गया। इसी तरह मरीचि शब्द वेदोंमें तेजोभेदके अर्थमें आता है। अतः जो बालक तत्काल अत्यन्त तेजस्वी रूपमें प्रकट हुआ, वह 'मरीचि' कहलाया। जिस बालकने जन्मान्तरमें ऋतुसंघ (यज्ञसमूह)-का सम्पादन किया था, वह वर्तमान जन्ममें ब्रह्माजीका पुत्र होनेपर भी उसी ऋतुके नामपर 'ऋतु' कहलाया। ब्रह्माजीका मुख प्रधान अङ्ग है। उस अङ्गसे उत्पन्न हुआ बालक इर अर्थात् तेजस्वी था, इसलिये 'अङ्गिरा' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शौनक! भृगु शब्द अत्यन्त तेजस्वीके अर्थमें विद्यमान है। ब्रह्माजीसे उत्पन्न जो बालक अत्यन्त तेजस्वी हुआ, उसका नाम 'भृगु' हुआ। जो बालक होनेपर भी तत्काल अत्यन्त तेजके कारण अरुण वर्णका हो गया और उच्च कोटिकी तपस्याके कारण तेजसे प्रज्वलित होने लगा, वह 'अरुण' नामसे विख्यात हुआ। जिस योगीके योगबलसे हंस उसके अधीन रहते थे, वह परम

(८६)


सुतपा ब्राह्मण


शिशु नारद

ब्रह्मखण्ड ८७

योगीन्द्र बालक 'हंसी' नामसे विख्यात हुआ। तत्काल प्रकट हुआ जो बालक वशीभूत और शिष्य होकर विधाताका अत्यन्त प्रीतिपात्र हुआ, उसका नाम 'वसिष्ठ' रखा गया। जिस बालकका तपमें सदा प्रयत्न देखा गया तथा जो सम्पूर्ण कर्मोंमें संयत रहा, वह अपने उसी गुणके कारण 'यति' कहलाया। वेदोंमें 'पुल' शब्द तपस्याके अर्थमें आता है और 'ह' स्फुट-अर्थमें। जिस बालकमें स्फुटरूपसे तपस्याका समूह लक्षित हुआ, वह उसी लक्षणसे 'पुलह' कहलाया। (पुलका अर्थ है—तप:-समूह और 'स्त्य' शब्द अस्ति—'है' के अर्थमें आया है) जिसके पूर्वजन्मोंके तपःसमूह विद्यमान हैं; इसी कारण जो तपः-संघस्वरूप है; वह इसी व्युत्पत्तिके द्वारा 'पुलस्त्य' के नामसे विख्यात हुआ। 'त्रि' शब्द त्रिगुणमयी प्रकृतिके अर्थमें आता है और 'अ' विष्णुके अर्थमें। जिसकी उन दोनोंके प्रति समान भक्ति है, उस बालकको 'अत्रि' कहा गया। जिसके मस्तकपर तपस्याके तेजसे प्रकट हुई अग्निशिखास्वरूपिणी पाँच जटाएँ थीं, उसका नाम 'पञ्चशिख' हुआ। जिसने दूसरे जन्ममें आन्तरिक अन्धकारसे रहित प्रदेशमें तप किया था, उस शिशुका नाम 'अपान्तरतमा' हुआ। जो स्वयं तपस्या करता और दूसरोंको भी उसकी प्राप्ति करा सकता था तथा जो तपस्याका भार वहन करनेमें पूर्ण समर्थ था, वह अपनी इसी योग्यताके कारण 'वोढु' कहलाया। मुने! जो बालक तपस्याके तेजसे सदा दीप्तिमान् रहता था तथा तपस्यामें जिसके चित्तकी स्वाभाविक रुचि थी, वह 'रुचि' नामसे प्रसिद्ध हुआ। जो ब्रह्माजीके क्रोधके समय ग्यारहकी संख्यामें प्रकट हुए और रोने लगे, वे रोदनके ही कारण 'रुद्र' कहलाये।

सौति [फिर] बोले—जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता है, वे भगवान् विष्णु पालक हैं। रजोगुणप्रधान ब्रह्मा सृष्टिकर्ता हैं तथा जिनमें तमोगुणकी प्रधानता है, वे 'रुद्र' कहे गये हैं। उनके वेगको रोकना कठिन है। वे बड़े भयंकर हैं। उन रुद्रोंमेंसे एकका नाम कालाग्नि रुद्र है, जो भगवान् शंकरके अंश हैं। वे ही जगत्‌का संहार करनेवाले हैं। शुद्ध सत्त्वस्वरूप जो शिव हैं, वे सत्पुरुषोंको कल्याण प्रदान करनेवाले हैं। अन्य रुद्र श्रीकृष्णकी कलामात्र हैं। केवल भगवान् विष्णु और शंकर उन परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके दो अंश हैं। वे दोनों ही समान सत्त्वस्वरूप हैं। ब्रह्मन्! यह बात मैंने रुद्रकी उत्पत्तिके प्रसंगमें बतायी है। आप उसे भूल क्यों रहे हैं। सच है, सभी लोग भगवान्‌की मायासे मोहित हो जाते हैं। मुनियोंको भी मतिभ्रम हो जाया करता है। 'सनक' ब्रह्माके प्रथम, 'सनन्दन' द्वितीय, 'सनातन' तृतीय और भगवान् 'सनत्कुमार' चतुर्थ पुत्र हैं। मुने! ब्रह्माजीने उन प्रथम चार पुत्रोंसे सृष्टि करनेके लिये कहा। परंतु उनके लिये यह कार्य असह्य हो गया। इससे ब्रह्माजीको बड़ा क्रोध हुआ। उसी क्रोधसे रुद्रोंकी उत्पत्ति हुई। सनक और सनन्दन—ये दोनों शब्द आनन्दके वाचक हैं। वे दोनों बालक भक्तिभावसे परिपूर्ण होनेके कारण सदा आनन्दित रहते हैं, इसलिये सनक और सनन्दन नामसे विख्यात हुए। नित्य परिपूर्णतम साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण ही सनातन पुरुष हैं। जो उनका भक्त है, वह भी वास्तवमें उन्हींके समान है। इसीलिये वह तीसरा कृष्ण-भक्त बालक सनातन नामसे विख्यात हुआ। 'सनत्' का अर्थ है नित्य और 'कुमार' का अर्थ है शिशु। नित्य शैशवावस्थासे सम्पन्न होनेके कारण इस बालकको ब्रह्माजीने सनत्कुमार नाम दिया। मुने! इस प्रकार मैंने ब्रह्माजीके पुत्रोंके नामोंकी व्युत्पत्ति बतायी। अब आप क्रमशः नारदजीके आख्यानको सुनिये।

(अध्याय २२)

८८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ब्रह्माजीसे सृष्टिके लिये दारपरिग्रहकी प्रेरणा पाकर डरे हुए नारदका स्त्री-संग्रहके दोष बताकर तपके लिये जानेकी आज्ञा माँगना

सौति कहते हैं— सृष्टिकर्ता ब्रह्माने अपने सब बालकोंको सृष्टिके कार्यमें लगाकर नारदजीको भी सृष्टि करनेके लिये प्रेरित किया। उन्होंने वेद-वेदाङ्गोंके पारंगत विद्वान् नारदसे यह सत्य, हितकर, वेदसारस्वरूप और परिणाममें सुख देनेवाली बात कही।

ब्रह्माजी बोले— कुलमें श्रेष्ठ मेरे प्राणवल्लभ पुत्र नारद! आओ। तुम ज्ञानदीपकी शिखासे अज्ञानान्धकारका निवारण करनेवाले हो। तुमसे यह बात छिपी नहीं है कि जन्मदाता पिता परम गुरु है। वह सभी वन्दनीय पुरुषोंमें सबसे श्रेष्ठ है। विद्यादाता और मन्त्रदाता दोनों समान हैं तथा पितासे भी बढ़कर हैं। बेटा! मैं तुम्हारा पिता, पालक, विद्यादाता एवं मन्त्रदाता भी हूँ। तुम मेरी आज्ञासे मेरी ही प्रसन्नताके लिये विवाह कर लो।

ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर मुनिवर नारदके कण्ठ, ओठ और तालु सूख गये। वे भयभीत होकर विनयपूर्वक बोले।

नारदजीने कहा— तात! वही पिता, वही गुरु, वही बन्धु, वही पुत्र और वही मेरा ईश्वर है, जो भगवान् श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंमें सुदृढ़ भक्ति उत्पन्न करा दे*। यदि बालक अज्ञानवश कुमार्गपर चल रहे हों तो उन्हींको जो उस मार्गसे हटाता है, वही करुणानिधान पिता है। जो श्रीकृष्ण-चरणोंमें लगी हुई भक्तिका त्याग कराकर पुत्रको दूसरे किसी विषयमें लगाये, वह कैसा पिता है? स्त्रीसंग्रह केवल दुःखका ही कारण है। उससे सुख नहीं मिलता। वह तपस्या, स्वर्ग, भक्ति, मुक्ति एवं सत्कर्मोंमें विघ्न उपस्थित करनेवाला है। ब्रह्मन्! मूढ़चित्त गृहस्थोंके घरोंमें तीन प्रकारकी स्त्रियाँ पायी जाती हैं—साध्वी, भोग्या और कुलटा। वे सब-की-सब स्वार्थपरायणा होती हैं। साध्वी स्त्री परलोकके भयसे, इस लोकमें अपनेको यश मिलनेके लोभसे तथा कामासक्तिसे भी निरन्तर स्वामीकी सेवा करती है। भोग्या स्त्री भोगकी अभिलाषिणी होती है। वह सदा केवल कामासक्तिसे ही प्रियतम पतिकी सेवा करती है। भोगके सिवा और किसी हेतुसे वह क्षणभर भी सेवा नहीं करती। भोग्या स्त्री जबतक वस्त्र, आभूषण, सम्भोग तथा सुस्निग्ध एवं उत्तम आहार पाती है, तबतक ही स्वामीके वशमें रहकर प्यारी बनी रहती है। कुलटा नारी कुलमें अंगारके समान है। वह कुलका नाश करनेवाली है। कुलटा स्त्री कपटसे ही स्वामीकी सेवा करती है, भक्तिसे नहीं। वे अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये सुधाके समान मधुर वचन बोलती हैं। क्रोध होनेपर उनके मुखसे विषके समान दुःसह वचन निकलता है। यदि उनकी बातपर विश्वास किया जाय तब तो सर्वनाश ही हो जाता है। उनके अभिप्रायको समझना बहुत कठिन है। केवल उनका कर्म छिपा होता है। सर्वज्ञ! आप सब कुछ जानते हैं; क्योंकि आत्माराम पुरुषोंके ईश्वर हैं। प्रभो! मुझपर अनुग्रह कीजिये और अब मुझे विदा दीजिये। आप कल्पवृक्षसे भी बढ़कर हैं। मैं आपसे श्रीकृष्ण-भक्तिकी याचना करता हूँ।

ऐसा कहकर नारदजीने पिताके चरण-कमलोंको पकड़कर मङ्गलमय तपके निमित्त जानेके लिये आज्ञा माँगी। फिर दोनों हाथ जोड़कर भक्तिभावसे मस्तक झुका ब्रह्माजीकी परिक्रमा एवं प्रणाम करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए। (अध्याय २३)


* स पिता स गुरुर्बन्धुः स पुत्रः स मदीश्वरः। यः श्रीकृष्णपादपद्मे दृढां भक्तिं च कारयेत्॥
(ब्रह्मखण्ड २३। १७)