ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ७१
श्वेतद्वीपमें क्यों गये थे? अंश और अंशीमें भेद नहीं है तथा आत्मामें भी भेदका अभाव है, यदि यही आपका निश्चित मत है तो बताइये श्रेष्ठ पुरुष कला (अंश)-का त्याग करके पूर्णतम (अंशी)-की उपासना क्यों करते हैं? यद्यपि पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णकी कोटि जन्मोंतक आराधना करके भी उन्हें वशमें कर लेना अत्यन्त कठिन है और असाधु पुरुषोंके लिये तो वे सर्वथा असाध्य हैं, तथापि लोगोंकी बलवती आशा उन्हींकी सेवा करना चाहती है। क्या छोटे और क्या बड़े, सभी परम पदको पाना चाहते हैं। जैसे बौना अपने दोनों हाथोंसे चन्द्रमाको छूना चाहे, उसी तरह लोग उन पूर्णतम परमात्माको हस्तगत करना चाहते हैं। जो विष्णु हैं, वे एक विषय (देश)-में रहते हैं। विश्वके अन्तर्गत श्वेतद्वीपमें निवास करते हैं। आप, ब्रह्मा, महादेव, धर्म तथा दिशाओंके स्वामी दिक्पाल भी एक देशके निवासी हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवेश्वर, देवसमूह और चराचर प्राणी—ये सब भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डोंमें अनेक हैं। उन ब्रह्माण्डों और देवताओंकी गणना करनेमें कौन समर्थ है? उन सबके एकमात्र स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण हैं, जो भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये दिव्य विग्रह धारण करते हैं। जिसे सभी पाना चाहते हैं, वह सत्यलोक या नित्य वैकुण्ठधाम समस्त ब्रह्माण्डसे ऊपर है। उससे भी ऊपर गोलोक है, जिसका विस्तार पचास करोड़ योजन है। वैकुण्ठधाममें वे सनातन श्रीहरि चार भुजाधारी लक्ष्मीपतिके रूपमें निवास करते हैं। वहाँ सुनन्द, नन्द और कुमुद आदि पार्षद उन्हें घेरे रहते हैं। गोलोकमें वे सनातनदेव दो भुजाओंसे युक्त राधावल्लभ श्रीकृष्णरूपसे निवास करते हैं। वहाँ बहुत-सी गोपाङ्गनाएँ, गौएँ तथा द्विभुज गोप-पार्षद उनकी सेवामें उपस्थित रहते हैं। वे गोलोकाधिपति श्रीकृष्ण ही परिपूर्णतम ब्रह्म हैं। वे ही समस्त देहधारियोंके आत्मा हैं। वे सदा स्वेच्छामय रूप धारण करके दिव्य वृन्दावनके अन्तर्गत रासमण्डलमें विहार करते हैं। दिव्य तेजोमण्डल ही उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् हैं। योगी एवं संत-महात्मा सदा उन्हीं निरामय परमात्माका ध्यान करते हैं। नूतन जलधरके समान उनकी श्याम कान्ति है। दो भुजाएँ हैं। श्रीअङ्गोंपर दिव्य पीताम्बर शोभा पाता है। उनका लावण्य करोड़ों कन्दर्पोंसे भी अधिक है। वे लीलाधाम हैं। उनका रूप अत्यन्त मनोहर है। किशोर अवस्था है। वे नित्य शान्त-स्वरूप परमात्मा मुखसे मन्द-मन्द मुस्कानकी आभा बिखेरते रहते हैं। वैष्णव संत उन्हीं सत्यस्वरूप श्यामसुन्दरका सदा भजन और ध्यान करते हैं। आपलोग भी वैष्णव ही हैं और मुझसे पूछ रहे हैं कि 'तुम्हारा जन्म किसके वंशमें हुआ है? तथा तुम किस मुनीन्द्रके शिष्य हो?' ऐसा प्रश्न मुझसे बार-बार किया गया है। देवताओ! मैं जिसके वंशमें उत्पन्न हूँ और जिसका बालक-शिष्य हूँ, उन्हींका यह ज्ञानमय वचन है। तुमलोग इसे सुनो और समझो। देवेश्वर सुरेश! गन्धर्वको शीघ्र जीवित करो। विचार व्यक्त करनेपर स्वतः ज्ञात हो जाता है कि कौन मूर्ख है और कौन विद्वान् ? अतः यहाँ वाग्युद्धका क्या प्रयोजन है?
शौनक ! ऐसा कहकर वे ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु चुप हो गये और जोर-जोरसे हँसने लगे।
(अध्याय १७)