भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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७०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

अट्ठाईसवें* इन्द्रके गत होनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है। इसी संख्यासे विशिष्ट सौ वर्षकी आयुवाले ब्रह्माजीका जब पतन होता है, तब परमात्मा विष्णुके नेत्रकी एक पलक गिरती है। मैं परमात्मा श्रीकृष्णकी एक श्रेष्ठ कलामात्र हूँ। अतः उनकी महिमाका पार कौन पा सकता है? मैं तो कुछ भी नहीं जानता।

शौनक! ऐसा कहकर भगवान् शंकर वहाँ चुप हो गये। तब समस्त कर्मोंके साक्षी धर्मने अपना प्रवचन आरम्भ किया।

धर्म बोले— जिनके हाथ-पैर तथा सबको देखनेवाले नेत्र सर्वत्र विद्यमान हैं; जो सबके अन्तरात्मारूपसे प्रत्यक्ष हैं, तथापि दुरात्मा पुरुष जिन्हें नहीं देख या समझ पाते; उन सर्वव्यापी प्रभुके सब देश, काल और वस्तुओंमें विद्यमान होनेपर भी जो तुमने यह कहा कि ‘अभीतक भगवान् विष्णु इस सभामें नहीं आये’, ऐसा किस बुद्धिसे निश्चय किया? तुम्हारी बात सुनकर मुनियोंको भी मतिभ्रम हो सकता है। जहाँ महापुरुषकी निन्दा होती हो, वहाँ साधु पुरुष उस निन्दाको नहीं सुनते; क्योंकि निन्दक श्रोताओंके साथ ही कुम्भीपाक नरकमें जाता है और वहाँ एक युगतक कष्ट भोगता रहता है। यदि दैववश महापुरुषोंकी निन्दा सुनायी पड़ जाय तो विद्वान् पुरुष श्रीविष्णुका स्मरण करनेपर समस्त पापोंसे मुक्त होता और दुर्लभ पुण्य पाता है। जो इच्छा या अनिच्छासे भी भगवान् विष्णुकी निन्दा करता है तथा जो नराधम सभाके बीचमें बैठकर उस निन्दाको सुनता और हँसता है, वह ब्रह्माजीकी आयुपर्यन्त कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। जहाँ श्रीहरिकी निन्दा होती है, वह स्थान मदिरापात्रकी भाँति अपवित्र माना जाता है। वहाँ जाकर यदि भगवन्निन्दा सुनी गयी तो सुननेवाला प्राणी निश्चय ही नरकमें पड़ता है। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें विष्णु-निन्दाके तीन भेद बताये थे। एक तो वह जो परोक्षमें निन्दा करता है, दूसरा वह जो श्रीहरिको मानता ही नहीं है तथा तीसरी कोटिका निन्दक वह ज्ञानहीन नराधम है, जो दूसरे देवताओंके साथ उनकी तुलना करता है। सौ ब्रह्माओंकी आयुपर्यन्त उस निन्दकका नरकसे उद्धार नहीं होता। जो नराधम गुरु एवं पिताकी निन्दा करता है, वह चन्द्रमा और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरकमें पड़ा रहता है। भगवान् विष्णु तीनों लोकोंमें सबके गुरु, पिता, ज्ञानदाता, पोषक, पालक, भयसे रक्षक तथा वरदाता हैं।

इन तीनोंकी बात सुनकर वे ब्राह्मणशिरोमणि हँसने लगे। फिर उन देवताओंसे मधुर वाणीमें बोले।

ब्राह्मणने कहा— हे धर्मशाली देवताओ! मैंने भगवान् विष्णुकी क्या निन्दा की है? श्रीहरि यहाँ नहीं आये इसलिये आकाशवाणीकी बात व्यर्थ हो गयी, यही तो मैंने कहा है। देवेश्वरो! धर्मके लिये सच बोलो। जो सभामें बैठकर पक्षपात करते हैं वे अपनी सौ पीढ़ियोंका नाश कर डालते हैं। आपलोग भावुक हैं, बताइये तो सही, यदि विष्णु सदा और सर्वत्र व्यापक हैं तो आपलोग उनसे वर माँगनेके लिये


* विष्णुपुराण प्रथम अंश अध्याय ३ के श्लोक १५ से १७ तक यह बात बतायी गयी है कि 'एक सहस्र चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होता है। ब्रह्माजीके एक दिनमें चौदह मनु होते हैं। सप्तर्षि, देवगण, इन्द्र, मनु तथा मनुपुत्र—ये एक ही कालमें उत्पन्न होते हैं और एक ही कालमें उनका संहार होता है।' इससे सूचित होता है कि चौदहवें इन्द्रके बीतनेपर ब्रह्माका दिन पूरा होता है; परंतु यहाँ २८ वें इन्द्रके गत होनेपर ब्रह्माका एक दिन बताया गया है। इसकी संगति तभी लग सकती है, जब एक मन्वन्तरमें दो इन्द्रकी सृष्टि और संहार माने जायँ। परंतु ऐसा माननेपर अन्य पुराणोंसे एकवाक्यता नहीं होगी।