ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा उपबर्हणको जीवित करनेकी चेष्टा, मालावतीद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन, शक्तिसहित भगवान्का गन्धर्वके शरीरमें प्रवेश तथा गन्धर्वका जी उठना, मालावतीद्वारा दान एवं मङ्गलाचार तथा पूर्वोक्त स्तोत्रके पाठकी महिमा
**सौति कहते हैं—**भगवान् विष्णुकी मायासे मोहित हुए ब्रह्मा और शिव आदि देवता ब्राह्मणके साथ मालावतीके निकट गये। ब्रह्माजीने शवके शरीरपर कमण्डलुका जल छिड़क दिया और उसमें मनका संचार करके उसके शरीरको सुन्दर बना दिया। फिर ज्ञानानन्दस्वरूप साक्षात् शिवने उसे ज्ञान प्रदान किया। स्वयं धर्मने धर्म-ज्ञान और ब्राह्मणने जीव-दान दिया। अग्निकी दृष्टि पड़ते ही गन्धर्वके शरीरमें जठरानलका प्राकट्य हो गया। फिर कामकी दृष्टि पड़नेसे वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न हो गया। जगत्के प्राणस्वरूप वायुका अधिष्ठान होनेसे उस शरीरके भीतर निःश्वास और प्राणोंका संचार होने लगा। फिर सूर्यके अधिष्ठित होनेसे गन्धर्वके नेत्रोंमें देखनेकी शक्ति आ गयी। वाणीकी दृष्टि पड़नेसे वाक्शक्ति और श्रीके दृष्टिपातसे शोभा प्रकट हुई। इतनेपर भी वह शव नहीं उठा। जडकी भाँति सोता ही रहा। आत्माका अधिष्ठान प्राप्त न होनेसे उसे विशिष्ट बोधकी प्राप्ति नहीं हुई। तब ब्रह्माजीके कहनेसे मालावतीने शीघ्र ही नदीके जलमें स्नान किया और दो धुले वस्त्र धारण करके उस सतीने परमेश्वरकी स्तुति प्रारम्भ की।
**मालावती बोली—**मैं समस्त कारणोंके भी कारणरूप उन परमात्माकी वन्दना करती हूँ, जिनके बिना भूतलके सभी प्राणी शवके समान हैं। वे निर्लिप्त हैं। सबके साक्षी हैं। समस्त कर्मोंमें सर्वत्र और सर्वदा विद्यमान हैं तो भी सबकी दृष्टि (जानकारी)-में नहीं आते हैं। जिन्होंने सबकी आधारभूता उस परात्परा प्रकृतिकी सृष्टि की है; जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी भी जननी तथा त्रिगुणमयी है; साक्षात् जगत्स्रष्टा ब्रह्मा जिनकी सेवामें नियमित रूपसे लगे रहते हैं; पालक विष्णु और साक्षात् जगत्संहारक शिव भी जिनकी सेवामें निरन्तर तत्पर रहते हैं; सब देवता, मुनि, मनु, सिद्ध, योगी और संत-महात्मा सदा प्रकृतिसे परे विद्यमान जिन परमेश्वरका ध्यान करते हैं; जो साकार और निराकार भी हैं; स्वेच्छामय रूपधारी और सर्वव्यापी हैं। वर, वरेण्य, वरदायक, वर देनेके योग्य और वरदानके कारण हैं, तपस्याके फल, बीज और फलदाता हैं; स्वयं तपःस्वरूप तथा सर्वरूप हैं; सबके आधार, सबके कारण, सम्पूर्ण कर्म, उन कर्मोंके फल और उन फलोंके दाता हैं तथा जो कर्मबीजका नाश करनेवाले हैं, उन परमेश्वरको मैं प्रणाम करती हूँ। वे स्वयं तेजःस्वरूप होते हुए भी भक्तोंपर अनुग्रहके लिये ही दिव्य विग्रह धारण करते हैं; क्योंकि विग्रहके बिना भक्तजन किसकी सेवा और किसका ध्यान करेंगे। विग्रहके अभावमें भक्तोंसे सेवा और ध्यान बन ही नहीं सकते। तेजका महान् मण्डल ही उनकी आकृति है। वे करोड़ों सूर्योंके समान दीप्तिमान् हैं। उनका रूप अत्यन्त कमनीय और मनोहर है। नूतन मेघकी-सी श्याम कान्ति, शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंके समान नेत्र, शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मन्द मुस्कानकी छटासे सुशोभित मुख और करोड़ों कन्दर्पोंको भी तिरस्कृत करनेवाला लावण्य उनकी सहज विशेषताएँ हैं। वे मनोहर लीलाधाम हैं। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित तथा रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। दो बड़ी-बड़ी भुजाएँ हैं, हाथमें मुरली है, श्रीअङ्गोंपर रेशमी पीताम्बर शोभा पाता है, किशोर अवस्था है। वे शान्तस्वरूप राधाकान्त अनन्त आनन्दसे परिपूर्ण हैं। कभी निर्जन वनमें गोपाङ्गनाओंसे घिरे रहते हैं। कभी रासमण्डलमें विराजमान हो राधा-