ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मखण्ड ७३
रानीसे समाराधित होते हैं। कभी गोप-बालकोंसे घिरे हुए गोपवेषसे सुशोभित होते हैं। कभी सैकड़ों शिखरवाले गिरिराज गोवर्धनके कारण उत्कृष्ट शोभासे युक्त रमणीय वृन्दावनमें कामधेनुओंके समुदायको चराते हुए बालगोपालके रूपमें देखे जाते हैं। कभी गोलोकमें विरजाके तटपर पारिजातवनमें मधुर-मधुर वेणु बजाकर गोपाङ्गनाओंको मोहित किया करते हैं। कभी निरामय वैकुण्ठधाममें चतुर्भुज लक्ष्मीकान्तके रूपमें रहकर चार भुजाधारी पार्षदोंसे सेवित होते हैं। कभी तीनों लोकोंके पालनके लिये अपने अंशरूपसे श्वेतद्वीपमें विष्णुरूप धारण करके रहते हैं और पद्मा उनकी सेवा करती हैं। कभी किसी ब्रह्माण्डमें अपनी अंशकलाद्वारा ब्रह्मारूपसे विराजमान होते हैं। कभी अपने ही अंशसे कल्याणदायक मङ्गलरूप शिव-विग्रह धारण करके शिवधाममें निवास करते हैं। अपने सोलहवें अंशसे स्वयं ही सर्वाधार, परात्पर एवं महान् विराट्-रूप धारण करते हैं, जिनके रोम-रोममें अनन्त ब्रह्माण्डोंका समुदाय शोभा पाता है। कभी अपनी ही अंशकलाद्वारा जगत्की रक्षाके लिये लीलापूर्वक नाना प्रकारके अवतार धारण करते हैं। उन अवतारोंके वे स्वयं ही सनातन बीज हैं। कभी योगियों एवं संत-महात्माओंके हृदयमें निवास करते हैं। वे ही प्राणियोंके प्राणस्वरूप परमात्मा एवं परमेश्वर हैं। मैं मूढ़ अबला उन निर्गुण एवं सर्वव्यापी भगवान्की स्तुति करनेमें सर्वथा असमर्थ हूँ। वे अलक्ष्य, अनीह, सारभूत तथा मन और वाणीसे परे हैं। भगवान् अनन्त सहस्र मुखोंद्वारा भी उनकी स्तुति नहीं कर सकते। पञ्चमुख महादेव, चतुर्मुख ब्रह्मा, गजानन गणेश और षडानन कार्तिकेय भी जिनकी स्तुति करनेमें समर्थ नहीं हैं, माया भी जिनकी मायासे मोहित रहती है, लक्ष्मी भी जिनकी स्तुति करनेमें सफल नहीं होती, सरस्वती भी जडवत् हो जाती है और वेद भी जिनका स्तवन करनेमें अपनी शक्ति खो बैठते हैं, उन परमात्माका स्तवन दूसरा कौन विद्वान् कर सकता है? मैं शोकातुर अबला उन निरीह परात्पर परमेश्वरकी स्तुति क्या कर सकती हूँ।*
*मालावत्युवाच
वन्दे तं परमात्मानं सर्वकारणकारणम् । विना येन शवाः सर्वे प्राणिनो जगतीतले ॥
निर्लिप्तं साक्षिरूपं च सर्वेषां सर्वकर्मसु । विद्यमानं न दृष्टं च सर्वैः सर्वत्र सर्वदा ॥
येन सृष्टा च प्रकृतिः सर्वाधारा परात्परा । ब्रह्मविष्णुशिवादीनां प्रसूर्या त्रिगुणात्मिका ॥
जगत्स्रष्टा स्वयं ब्रह्मा नियतो यस्य सेवया । पाता विष्णुश्च जगतां संहर्ता शंकरः स्वयम् ॥
ध्यायन्ते यं सुराः सर्वे मुनयो मनवस्तथा । सिद्धाश्च योगिनः सन्तः सन्ततं प्रकृतेः परम् ॥
साकारं च निराकारं परं स्वेच्छामयं विभुम् । वरं वरेण्यं वरदं वराहं वरकारणम् ॥
तपःफलं तपोबीजं तपसां च फलप्रदम् । स्वयं तपःस्वरूपं च सर्वरूपं च सर्वतः ॥
सर्वाधारं सर्वबीजं कर्म तत्कर्मणां फलम् । तेषां च फलदातारं तद्बीजं क्षयकारणम् ॥
स्वयं तेजःस्वरूपं च भक्तानुग्रहविग्रहम् । सेवाध्यानं न घटते भक्तानां विग्रहं विना ॥
तत्तेजो मण्डलाकारं सूर्यकोटिसमप्रभम् । अतीव कमनीयं च रूपं तत्र मनोहरम् ॥
नवीननीरदश्यामं शरत्पङ्कजलोचनम् । शरत्पार्वणचन्द्रास्यमीषद्विकास्यसमन्वितम् ॥
कोटिकन्दर्पलावण्यं लीलाधाम मनोहरम् । चन्दनोक्षितसर्वाङ्गं रत्नभूषणभूषितम् ॥
द्विभुजं मुरलीहस्तं पीतकौशेयवाससम् । किशोरवयसं शान्तं राधाकान्तमनन्तकम् ॥
गोपाङ्गनापरिवृतं कुत्रचिन्निर्जने वने । कुत्रचिद्रासमध्यस्थं राधया परिसेवितम् ॥
कुत्रचिद् गोपवेशं च वेष्टितं गोपबालकैः । शतशृङ्गाचलोत्कृष्टे रम्ये वृन्दावने वने ॥
निकरं कामधेनूनां रक्षन्तं शिशुरूपिणम् । गोलोके विरजातीरे पारिजातवने वने ॥
वेणुं क्वणन्तं मधुरं गोपीसम्मोहकारणम् । निरामये च वैकुण्ठे कुत्रचिच्च चतुर्भुजम् ॥