भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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ब्रह्मखण्ड ८३

बहुसंख्यक नर उत्पन्न हुए थे। उनके कण्ठने नरका दान किया था, इसलिये वह 'नरद' कहलाया। उस नरद अर्थात् कण्ठसे बालककी उत्पत्ति हुई, इसलिये ब्रह्माजीने उसका मङ्गलमय नाम नारद रखा। अब आप सावधान होकर उस शिशुका वृत्तान्त सुनिये। बालकके नारद नामकी उपलब्धिमें क्या रहस्य है, इस बातकी जानकारी होनेसे कौन-सा विशिष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। वह गोपीका बालक ब्राह्मणके घरमें प्रतिदिन बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित उस गोपीका अपनी पुत्रीकी भाँति पालन करते थे, इसी बीचमें कुछ महातेजस्वी ब्राह्मण, जो देखनेमें पाँच वर्षके बालकोंकी भाँति जान पड़ते थे, उस ब्राह्मणके घर आये। वे अपने तेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक सूर्यकी प्रभाको तिरस्कृत कर रहे थे। गृहस्थ ब्राह्मणने मधुपर्क आदि देकर उन सबको प्रणाम किया। भोजनके समय उन चारों मुनिवरोंने ब्राह्मणके दिये हुए फल-मूल आदिका आहार ग्रहण किया। उनकी जूठन उस शिशुने खायी। उनमें जो चौथे मुनि थे, उन्होंने उस बालकको प्रसन्नतापूर्वक श्रीकृष्ण-मन्त्रका उपदेश दिया। ब्राह्मण और अपनी माताकी आज्ञासे वह बालक उन चारों महात्माओंका दास बनकर उनकी सेवा-टहल करता रहा। एक दिन उस शिशुकी माता रातके समय मार्गपर चल रही थी। इतनेहीमें एक साँपने उसे डँस लिया और वह श्रीहरिका स्मरण करती हुई तत्काल चल बसी। वह सती साध्वी गोपी उत्तम रत्नोंद्वारा निर्मित वैष्णव विमानपर बैठकर विष्णु-पार्षदोंके साथ उसी क्षण वैकुण्ठधाममें जा पहुँची। प्रातः-काल वह बालक उन ब्राह्मणोंके साथ गृहस्थ ब्राह्मणके घरसे चल दिया। उन कृपालु ब्राह्मणोंने उस बालकको तत्त्वज्ञान प्रदान किया। इसके बाद वे सब ब्रह्मकुमार उस शिशुको वहीं छोड़कर अपने स्थानको चले गये। वह शिशु बड़ा ज्ञानी था। अतः गङ्गाजीके मनोहर तटपर ठहर गया। वहाँ स्नान करके उसने ब्राह्मणोंके दिये हुए विष्णु-मन्त्रका जप किया, जो क्षुधा, पिपासा, रोग तथा शोकको हर लेनेवाला है और वेदोंमें भी दुर्लभ है। घोर विशाल वनमें पीपलके नीचे योगासन लगाकर वह बालक वहाँ सुदीर्घकालतक बैठा रहा।

**शौनकने पूछा—**सूतनन्दन! उस बालकको किस मन्त्रकी प्राप्ति हुई? बुद्धिमान् सनत्कुमारके दिये हुए श्रीहरिके उस उत्तम मन्त्रको आप मुझे बतानेकी कृपा करें।

**सौति बोले—**शौनकजी! पूर्वकालमें भगवान् श्रीकृष्णने गोलोक-धामके भीतर ब्रह्माजीको कृपापूर्वक जिस बाईस अक्षरवाले मन्त्रका उपदेश दिया था, वह वेदोंमें भी परम दुर्लभ है। ब्रह्माजीने बुद्धिमान् सनत्कुमारको उनके भक्तिभावसे प्रभावित होकर वह मन्त्र दिया तथा सनत्कुमारने उक्त गोपी-बालकको उस मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—

ॐ श्रीं नमो भगवते रासमण्डलेश्वराय श्रीकृष्णाय स्वाहा।

—यह मन्त्र कल्पवृक्षस्वरूप है। इसके साथ ही महापुरुषस्तोत्र तथा पूर्वोक्त कवच भी दिया। इस मन्त्रके लिये उपयोगी जो सामवेदोक्त ध्यान है, उसका भी उपदेश कर दिया। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तेजोमण्डलस्वरूप जो अनिर्वचनीय चिन्मय प्रकाश है, उसमें ध्यान लगाकर योगी, सिद्धगण तथा देवता मनोवाञ्छित रूपका साक्षात्कार करते हैं। वैष्णवजन उस ज्योतिःपुञ्जके भीतर अपने निकट ही जिस रूपका ध्यान करते हैं, वह अत्यन्त कमनीय, अनिर्वचनीय एवं मनोहर है। नूतन जलधरके समान उसकी श्याम कान्ति है। नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल पङ्कजकी शोभाको छीने लेते हैं। मुख शरत्पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्लादजनक है। अधर कटे हुए बिम्बफलसे भी अधिक अरुण है। मोतियोंकी पंक्तिको तिरस्कृत