ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८२ || संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
उपबर्हणके जन्मकी कथा सुनाकर कहा कि गोपराज बदरिकाश्रममें जाकर योगबलसे शरीरको त्यागनेके पश्चात् विमानद्वारा वैकुण्ठधाममें चले गये। तत्पश्चात् शोकविह्वला कलावतीको अपनी माता कहकर एक दयालु ब्राह्मण अपने घर ले गये। साध्वी कलावतीने ब्राह्मणके ही घरमें रहकर एक श्रेष्ठ पुत्रको जन्म दिया, जिसकी अङ्गकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान दमक रही थी। वह ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहा था। उस घरमें रहनेवाली सभी स्त्रियोंने उस सुन्दर बालकको देखा। वह अपने ब्रह्मतेजसे ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालिक प्रचण्ड सूर्यकी प्रभाको पराजित कर रहा था। उसका रूप कामदेवसे भी अधिक सुन्दर तथा मुख चन्द्रमासे भी अधिक मनोहर था। उसके मुखकी शोभासे शरत्पूर्णिमाका चन्द्र लज्जित हो रहा था। उसके नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते थे। ललित हाथ-पैर, सुन्दर कपोल और मनोहर आकृति थी। पद्म और चक्रसे चिह्नित उसके चरणारविन्द अनुपम परम उज्ज्वल प्रतीत होते थे। उसके दोनों हाथोंकी भी कहीं तुलना नहीं थी। वह स्तन पीनेके लिये रो रहा था। स्त्रियाँ उस बालकको देखकर बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने-अपने आश्रमको गयीं। पुत्र और स्त्रीसहित ब्राह्मण भी बड़े प्रसन्न हुए और नृत्य करने लगे। वह बालक शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति दिनोंदिन बढ़ने लगा। ब्राह्मण पुत्रसहित कलावतीका पुत्रीकी भाँति पालन करने लगा।
सौति कहते हैं— शौनकजी! समयके अनुसार क्रमशः बढ़ता हुआ वह बालक पाँच वर्षका हो गया। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण था। वह सदा ज्ञानसे सम्पन्न रहता था। उसे पूर्वजन्ममें जपे हुए मन्त्रका सदा स्मरण बना रहा। अतः वह निरन्तर श्रीकृष्णके नाम, यश और गुण आदिका गान किया करता था। क्षणभरमें रोने लगता और दूसरे ही क्षण नृत्य करते हुए उसका सारा शरीर रोमाञ्चित हो उठता था। वह बालक जहाँ-जहाँ श्रीकृष्णसे सम्बन्ध रखनेवाली गाथा तथा तत्सम्बन्धी पुराण सुनता, वहीं ठहरता था। उसके सारे अङ्ग धूलसे धूसरित रहते थे। वह धूलमें भगवान्की प्रतिमा बनाकर धूलसे ही श्रीहरिका पूजन करता और धूलका ही अभीष्ट नैवेद्य अर्पित करता था। मुने! यदि माता सबेरे कलेवेके लिये बेटेको बुलाती तो वह माताको यही उत्तर देता था कि ‘मैं श्रीहरिका पूजन करता हूँ।’
शौनकने पूछा— सूतनन्दन! इस बालकका इस नये जन्ममें क्या नाम हुआ? संज्ञा और व्युत्पत्तिके साथ आप उसे बतानेकी कृपा करें।
सौतिने कहा— शौनकजी! अनावृष्टिके अन्तमें वह बालक उत्पन्न हुआ था। अतः जन्मकालमें जगत्को नार (जल) प्रदान किया। इसीसे उसका नाम ‘नारद’ हुआ। पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रखनेवाला वह महाज्ञानी बालक दूसरे बालकोंको नार अर्थात् ज्ञान देता था, इसलिये भी नारद नामसे विख्यात हुआ। मुने! वह मुनीन्द्र नारदसे ही उत्पन्न हुआ था, इस कारण भी उसका नाम नारद रखा गया।
शौनकजीने पूछा— शिशुका जो नारद नाम रखा गया था, वह तो व्युत्पत्तिके अनुसार उचित जान पड़ा। परंतु उसके उत्पादक मुनीन्द्रका मङ्गलमय नाम नारद किस प्रकार हुआ?
सौतिने कहा— शौनकजी! धर्मपुत्र मुनिवर नरने पुत्रहीन ब्राह्मण कश्यपको पुत्र प्रदान किया था, अतः नरप्रदत्त होनेके कारण उसका नाम नारद हुआ।
शौनक बोले— सूतनन्दन! अब मैंने शिशुके भी नारद नामकी व्युत्पत्ति सुन ली। अब यह बताइये कि शूद्रयोनिमें तथा ब्रह्मपुत्र-अवस्थामें उनका नाम नारद कैसे सम्भव हुआ?
सौतिने कहा— कल्पान्तरमें ब्रह्माजीके कण्ठसे