भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

ब्रह्मखण्ड
८१


जाता है। द्विज शौनक! जो सदा भक्तिभावसे इस स्तवराजको सुनता है उसके लिये तीनों लोकोंमें कुछ भी असाध्य नहीं रह जाता। भारतवर्षमें उसको कभी अपने बन्धुओंसे वियोगका दुःख नहीं होता। वह अविचल एवं महान् ऐश्वर्यका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। जो पूर्ण संयमसे रहकर अत्यन्त भक्तिभावसे एक मासतक इस स्तोत्रका श्रवण करता है, वह यदि भार्याहीन हो तो अति विनयशील सती-साध्वी सुन्दरी भार्या पाता है। जो महान् मूर्ख और खोटी बुद्धिका है, ऐसा मनुष्य यदि इस स्तोत्रको एक मासतक सुनता है तो वह गुरुके उपदेशमात्रसे बुद्धि और विद्या पाता है। जो प्रारब्ध-कर्मसे दुःखी और दरिद्र मनुष्य भक्तिभावसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसे निश्चय ही भगवान् शंकरकी कृपासे धन प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन तीनों संध्याओंके समय इस उत्तम स्तोत्रको सुनता है, वह इस लोकमें सुख भोगता, परम दुर्लभ कीर्ति प्राप्त करता और नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें भगवान् शंकरके धामको जाता है, वहाँ श्रेष्ठ पार्षद होकर भगवान् शिवकी सेवा करता है।
(अध्याय १९)


गोपपत्नी कलावतीके गर्भसे एक शिशुके रूपमें उपबर्हणका जन्म, शूद्रयोनिमें उत्पन्न बालक नारदकी जीवनचर्या, नामकी व्युत्पत्ति, उसके द्वारा संतोंकी सेवा, सनत्कुमारद्वारा उसे उपदेशकी प्राप्ति, उसके द्वारा श्रीहरिके स्वरूपका ध्यान, आकाशवाणी तथा उस बालकके देह-त्यागका वर्णन

**सौति कहते हैं—**उपबर्हण गन्धर्व अपनी पत्नी मालावतीके साथ तथा अन्य पत्नियोंके साथ भी निर्जन वनमें आनन्दपूर्वक विहार करने लगे। उन्होंने अपनी आयुका शेष काल सानन्द बिताना आरम्भ किया। उपबर्हणके पिता गन्धर्वराज भी स्त्री-पुत्रोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक रहने लगे। उन्होंने नाना प्रकारके श्रेष्ठ कर्म तथा बड़े-बड़े पुण्य कर्म किये। वे कुबेर-भवनके समान वैभवशाली गृहमें राजा होकर राजसुखका उपभोग करने लगे। उन्होंने अपनी सुस्थिरयौवना सुशीला पत्नीके साथ कुछ कालतक विहार किया। फिर समय आनेपर गङ्गाजीके मनोहर तटपर पत्नीसहित गन्धर्वराज प्राणोंका परित्याग करके सानन्द वैकुण्ठधामको चले गये। वे शैव थे, इसलिये उनपर शिवजीकी कृपा हुई तथा उनके पुत्रने श्रीविष्णुकी सेवा की थी, इसलिये भगवान् विष्णुकी भी उनपर कृपादृष्टि हुई। इससे वे वैकुण्ठमें श्रीविष्णुके श्याम-चतुर्भुजरूपधारी पार्षद हुए। माता-पिताका संस्कार करके गन्धर्व उपबर्हणने ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन दिये। शौनकजी! फिर अन्तकाल आनेपर ब्रह्माजीके शापसे प्राणोंका परित्याग करके उस विद्वान् गन्धर्वने ब्राह्मणके वीर्य और शूद्राके गर्भसे जन्म ग्रहण किया। सती मालावतीने मनमें उत्तम संकल्प ले भारतभूमिके पुष्कर तीर्थमें अग्निकुण्डके भीतर अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। वह साध्वी मनुवंशी राजा सृंजयकी पत्नीसे उत्पन्न हुई। उसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण रहता था। उस सुन्दरीके मनमें यही संकल्प था कि उपबर्हण गन्धर्व मेरे पति हों।

**शौनकजीने पूछा—**सूतनन्दन! उपबर्हण गन्धर्व ब्राह्मणके वीर्य और शूद्र-पत्नीके गर्भसे किस प्रकार उत्पन्न हुए? यह आप बतानेकी कृपा करें।

शौनकजीके यों पूछनेपर सूतजीने 'गोपराज द्रुमिलकी पत्नी कलावतीने मुनिवर काश्यपके स्खलित शुक्रको ग्रहण कर लिया था, इससे उसको पुत्रकी प्राप्ति हुई थी'—इस प्रकार