भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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आहार संबंधी नियम

८७

ब्रह्मचर्य के संरक्षण में अत्यन्त सुगमता प्राप्त होगी । “जब आहार शुद्ध है तो मन और बुद्धि भी शुद्ध है । जब मन आत्मा, सूक्ष्म और कारण शरीर शुद्ध हो जाते हैं तो पूर्वजन्मों की स्मरण या धारण-शक्ति निश्चय पूर्वक बढ़ जाती है । जब स्मरण शक्ति के बढ़नेसे अनंत भूत और भविष्य का ज्ञान हो जाता है तो हृदय की गंधियों खुल जाती हैं तथा मनुष्य अपनी अहंकार मयी आसक्तियों को त्याग सार्वभौमिक आत्मा के साथ संसर्ग प्राप्त करता है । ऐसे मनुष्य को भगवान स्वयं आत्मज्ञान का प्रकाशन करते हैं ।”

यह कहना अनावश्यक है कि ब्रह्मचर्य के रक्षण में आहार का भी अपना एक विशिष्ट स्थान है । भोजन पदार्थों का प्रभाव जो मस्तिष्क, विचार, काम, क्रोध आदि पर पड़ता है, वह विलक्षण है । मस्तिष्क में कई भिन्न भिन्न स्थान हैं और प्रत्येक आहार-पदार्थ प्रत्येक स्थान पर तथा विस्तृत शरीर पर अपना एक विशिष्ट प्रभाव उत्पादन करता है । गोरधे (एक प्रकार की ब्दिच्या) का पकवान कामोद्दीपक प्रभाव की उत्पत्ति करता है । वह जननेन्द्रियों को तत्क्षण उत्तेजित करता है । लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडे आदि काम को उत्तेजित करते हैं । ध्यान दीजिये कि हाथी और गायें जो घास खाकर जीवन व्यतीत करते हैं, कैसे शान्त और निश्चल होते हैं तथा शेर और अन्य मांसाहारी पशु जो मांस खाकर ही जीते हैं, वे कैसे भयंकर और निर्दई होते हैं । ब्रह्मचर्य के संरक्षण में सहायता प्रदान करने वलि भोजन पदार्थों के चुनाव में अंतः प्रेरणा ही आपका पथ प्रदर्शन करेगी । आप अन्य वयो-वृद्ध अनुभवी पुरुषों से भी समाति ग्रहण कर सकते हैं ।