ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
मिताहार
भोजन में संयम रखना ही मिताहार कहलाता है। स्वास्थ्ययद सात्विक भोजन आपके पेटभर खाइये। चौथाई पेट पानी से भरिये, बने हुए एक चौथाई भाग को हवा के लिये खाली छोड़ दीजिये। यह मिताहार है। ब्रह्मचारियों को नित्य मिताहारी होना चाहिये। रात्रि के भोजन के संबंध में उन्हें अधिक सावधान रहना चाहिये। रात्रि में उन्हें भर पेट भोजन नहीं करना चाहिये। अधिक भोजन ही रात्रि में स्वप्नदोष का कारण है। पेटू (भोजन भट्ट) कभी स्वप्न में भी ब्रह्मचारी नहीं बन सकता। यदि आप ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना चाहते हैं तो जिह्वा का संयम परमावश्यक है। जिह्वा और जननेन्द्रिय के बीच में वनिष्ठ संबंध है। जिह्वा एक ज्ञानेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के सात्विक भाग से बनी हुई है। जननेन्द्रिय एक कर्मेन्द्रिय है। वह जल तन्मात्रा के राजसिक अंश से बनी हुई है। वे दोनों बहिन हैं क्योंकि उन दोनों का आधार एक ही है। यदि जिह्वा राजसिक भोजन के द्वारा उत्तेजित होती है तो जननेन्द्रिय भी तत्काल उत्तेजित हो जाती है। भोजन में संकलन (चुनाव) और नियन्त्रण होना चाहिये। ब्रह्मचारी का भोजन सादा, मृदु (कोमल), मसाला रहित, और अनुत्तेजक होना चाहिये। भोजन में संयम की पूरी पूरी आवश्यकता है। पेट को ठूस कर भर लेना अत्यन्त घातक है। फल परम लाभदायक हैं। भोजन आपको केवल उसी समय करना चाहिये जब आप वास्तव में भूले हों। कभी कभी पेट आपको छोखा देगा। आपको भूद मृद की भूल प्रतीत होगी। परन्तु उशाही आप भोजन करने के लिये