भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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व्रत तथा ब्रह्मचर्य

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बैठेंगे कि आपको भूल नहीं प्रतीत होगी और न आपको भोजन स्वादिष्ट ही लगेगा। मन के नियन्त्रण और ब्रह्मचर्य की प्राप्ति के लिये नियमित भोजन और व्रत अत्यन्त सहायक हैं। इनको कभी भी तुच्छ समझ कर अस्वीकार न कीजिये।

व्रत (उपवास) तथा ब्रह्मचर्य

व्रत से कामवासना का नियन्त्रण होता है। उससे भावुकता शांत होती है। वह इन्द्रियों को भी वश में करता है। व्रत एक बड़ा भारी तप है। वह मन को पवित्र बनाता है। उससे अनेकानेक पाप नष्ट होते हैं। चन्द्रायण, कुल्लु, एकादशी और प्रदोष ये सब मन की शुद्धि के लिये शास्त्र-सम्मत व्रत हैं। व्रत से विशेष कर जिहा—जो आप की परम शत्रु है—का नियन्त्रण होता है। जब आप व्रत रखें तो मन में स्वादिष्ट भोजनों का विचार उत्पन्न न होने दें। यदि ऐसा न करेंगे तो आपको अधिक लाभ नहीं होगा। व्रत स्वांस संबंधी, रक्त संबंधी, पाचन संबंधी तथा मूत्र संबंधी कौनों को शुद्ध करता है। वह शरीर के सब प्रकार के मल तथा सब प्रकार के विष का नाश करता है। वह खट्टे तीखे पदार्थ-संग्रह को कम करता है। जिस प्रकार अशुद्ध होने को बार बार अग्नि में तपा कर शुद्ध किया जाता है, ठीक उसी प्रकार बार बार व्रत करने से मन को भी शुद्ध किया जाता है। नवयुवक दृष्टिपूर्व ब्रह्मचारियों को चाहिए कि जब कभी उन्हें काम सताने लगे तो तुरंत अनारार व्रत धारण करले। व्रत के तमय जब मन शांत होता है तो ध्यान बहुत अच्छा होगा। व्रत के समय जब सब इन्द्रियां शांत रहती हैं तो ध्यान का लूट अभ्यास करना चाहिये, यही व्रत का मुख्य उद्देश्य है। सब इन्द्रियों