भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

को विषयों से हटाकर मन को भगवान में एकाग्र कर देना चाहिये। प्रकाश दिखाकर आपको पथ-प्रदर्शन करने के लिये, भगवान से प्रार्थना कीजिये। भाव सहित प्रार्थना कीजिये “हे भगवान मुझे पथ-प्रदर्शन कीजिये, मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपका हूँ” आप को पवित्रता, प्रकाश, बल और ज्ञान की प्राप्ति होगी। व्रत योग के दश नियमों में से एक नियम है आर्यधिक व्रत न करें उससे दुर्बलता प्राप्त होगी। अपनी साधारण बुद्धि से काम लीजिये। जो मनुष्य पूर्ण व्रत रखने में असमर्थ हों, वे केवल नौ या बारह घंटे तक ही व्रत रखने और तब शार्यकाल या रात्रि में दूध या फल ग्रहण कर सकते हैं। पेट, यकृत, आदि पाचन किया संबंधी इंद्रियों को व्रत के समय, विश्राम मिलता है। जो पेटू या निरंतर खाने वाले मनुष्य हैं, वे अपनी इंद्रियों को चंद मिन्टों के लिये भी विश्राम नहीं देते। यही कारण है कि उनकी ये इंद्रियाँ शीघ्र रोगग्रस्त होजाती हैं मधुमेह, मंदाग्नि और यकृत (जिगर) आदि के रोग आर्यधिक अहार के ही कारण होते हैं। वास्तव में देखा जाय तो मनुष्य को बहुत ही अल्प भोजन की आवश्यकता है। नन्हे फी सदी मनुष्य संसार में आवश्यकता से अधिक भोजन करते हैं। आवश्यकता से अधिक खाने का उन का स्वभाव पड़ गया है। सब रोगों का कारण आर्यधिक भोजन ही है। उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने, आंतरिक इंद्रियों को विश्राम देने तथा ब्रह्मचर्य का अवलंबन करने के लिये समय समय पर व्रत रखना प्रत्येक मनुष्य के लिये परमावश्यक है। कई रोग जिन को एलोपैथी और डाक्टरों ने असाध्य घोषित कर रखा है व्रत या निराहार के द्वारा