भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

सर्वात्तम साधना है ! अन्य जनों के लिये हठ-पौगिक कियाएँ उत्तम हैं ।

आप महीनों और वर्षों पर्यन्त मैथुन से बचे रह सकते हैं, परंतु आप के मन में काम की तनिक भी वासनायें नहीं होनी चाहिए जब आप कभी विपरीत लिंग वाले व्यक्ति के साथ में हो तो आपके मन में कुत्सित विचार भी उत्पन्न न होने चाहिये । यदि आप इस लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर लेंगे तो आप पूर्ण ब्रह्मचर्य में स्थित होजायेंगे । आप भव सागर को पार कर चुकेगे । व्यक्ति की और देखने में कोई हानि नहीं है परंतु आपकी दृष्टि पवित्र होनी चाहिये । आप में आत्मभाव होना चाहिये । जब आप कभी किसी व्यक्ति की ओर देखें तो मन में ऐसी भावना कीजिये “हे माता आप को नमस्कार । आप मां काली की एक व्यक्त प्रतिमा हैं । मुझे प्रलोभन न दीजिये । मुझे न फुसलाइये । अब मैं माया और उनकी उत्पत्ति का भेद समझ गया हूँ । इन प्रतिमाओं को किसने सृजन किया है ? इन नाम और रूपों के पीछे एक सर्व शक्तिमान सर्वव्यापी और सर्वानंद मय लक्षण है । यह वह नश्वर असत्य सुन्दरताओं की सुन्दरता है । वह सठिका कर्ता या ईश्वर सुंदरताओं की सुंदरता है । वह अविनाशी सुंदरता की प्रतिमूर्ति है । वह सुंदरता का मुख्य आधार है । ध्यान के द्वारा मुझे इस सुंदरताओं की सुंदरता का अनुभव करना चाहिये ।” जब आप किसी आकर्षित करने वाली सुंदर आकृति या मूर्ति के रचयिता को याद रखते हुए भक्ति, प्रशंसा और आदर का भाव रखेंगे । तब आपको प्रलोभन नहीं होगा । यदि आप वेदान्त के विद्यार्थी हैं तो यह भावना कीजिये “प्रत्येक वस्तु