ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसर्वांगासन
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लिये आरम्भ में किसी दीवाल या अपने मित्र की सहायता लीजिये। कुछ अभ्यास के बाद आप स्वयं संतुलन (स्थिरता) प्राप्त करने में समर्थ होंगे। जब आसन कर चुकें तो टांगों को बहुत धीरे धीरे नीचे ले आइये। आसन करते समय केवल नाक के द्वारा स्वांस लीजिये। अनियमित रूप से कुम्भक, रेचक और पूरक करने से आसन में अस्थिरता आ जायगी।
इस आसन का अभ्यास खाली पेट करना चाहिए। इस आसन के द्वारा पेट के, आंतों के, फेफड़े के, हृदय के, गुर्दा के, कानों के, आंखों के तथा मूत्र संबंधी अनेकानेक
पुराने असाध्य रोग नष्ट होते हैं।
आसन करते समय यदि आपकी टांगें हिलती हों तो कुछ समय के लिये स्वांस को रोकिये; टांगों में स्थिरता आजायगी।
(३) सर्वांगासन
यह भी एक परमावश्यक आसन है। यह भी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने, आयु को दीर्घ बनाने, भूत व पाच न शक्ति को बढ़ाने तथा थाइ-रोइड (Thyroid) को कुशलता पूर्वक चालू रखने में सहायता प्रदान