भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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मत्स्यासन

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सर्वांगासन के पश्चात् तुरत मत्स्यासन करना चाहिए। सर्वांगासन से गर्दन व तत्संबंधी भागों में जो ऐंठन या रूखापन आ जाता है उसे यह आसन दूर कर देता है। इसके गर्दन तथा कंधों के संकुचित भागों को एक प्रकार से अन्च्छी हल्की सी मालिश हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस आसन से प्रायः वे सभी लाभ प्राप्त हो जाते हैं जो सर्वांगासन से होते हैं।

दाये पैर को बाईं जंघा पर तथा बांये पैर को दाहिनी जंघा पर रखकर बैठ जाइये। अब कमर के बल चित्त लेट जाइये। मस्तक को इस प्रकार फैलाइये कि उसका ऊपरी भाग पृथ्वी पर दृढ़ता पूर्वक सटा रहे और उधर नीचे की ओर आपके दोनों चूतड़ (नितंब) भी जमीन से सटे रहें; कमर जमीन से ऊपर उठी हुई रहनी चाहिये ताकि एक प्रकार का पुल बन जाय। अब दोनों हाथों को जंघाओं पर रख दीजिये या पैरों के अंगुटों को हाथों से पकड़ लीजिये। यह मत्स्यासन अनेक रोगों का नाश करने वाला है। यह आसन साधारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।

(५) पादगुप्तासन

पंजों के बल बांये पैर को ऊपर उठाकर उसकी ऐँड़ी को गुदा के ठीक बीचों बीच रखिए। शरीर का सारा भार पंजों पर रहना चाहिये। दाहिने पैर को बाईं जंघा के ऊपर घुटने के पास रखिये। हाथों को चूतरों पर रख संतुलित होकर सावधानी से बैठिये। धीरे धीरे स्वांस लीजिये। इस आसन को अपने आप करने में यदि आपको कठिनाई मालूम हो तो आप इसको किसी बेंच या दीवाल के सहारे बैठकर कर सकते हैं।