ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
गुदा स्थान की चौड़ाई केवल चार इंच है। इसी स्थान के नीचे वीर्य नाड़ी रहती है जिसके द्वारा वीर्य अंडकों में पहुँचता है। इस नाड़ी पर एड़ी का दबाव पड़ने से वीर्य का बाहरी प्रवाह रुक जाता है। इस आसन का दृढ़ अभ्यास करने से स्वप्नदोष मिटता है तथा साधक ऊर्ध्व रेता योगी बन जाता है। शीर्षासन, सर्वांगासन और सिद्धासन का संयुक्त प्रयोग ब्रह्मचर्य के लिये अत्यन्त लाभदायक है। प्रत्येक का अपना विशेष कार्य है। सिद्धासन अंडकोष और तत्संबंधी भागों पर प्रभाव डालता है तथा वीर्य की उत्पत्ति को रोकता है। शीर्षासन और सर्वांगासन वीर्य को ऊपर मस्तिष्क की ओर ले जाने में सहायता प्रदान करते हैं। पादांगुष्ठ्यासन शुक्र संबंधी नाड़ी पर पूर्ण प्रभाव डालता है।
आसन संबंधी सूचनायें
शारीरिक व्यायामों से प्राण बाहर की जाते हैं और आसनों के अभ्यास से प्राण अन्दर जाते हैं। आसन शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के बलों को बढ़ाने वाले हैं।
आसनों के द्वारा इन्द्रियां मन और शरीर सभी नियन्त्रित किये जा सकते हैं। इनसे शरीर, नाड़ियां और पुष्टि शुद्ध होते हैं। यदि आप डंड बैठकों का अभ्यास पांच सौ प्रति दिन की दर से पांच वर्षों तक भी करें तो भी आपको आध्यात्मिक अनुभव कुछ भी नहीं प्राप्त हो सकते। साधारण शारीरिक व्यायाम केवल शरीर के वायु पुष्टों (अंगों) को ही पुष्ट करते हैं। शारीरिक व्यायामों के द्वारा मनुष्य एक सुन्दर डील डोल वाला सेंडो (पहलवान) बन सकता है। परन्तु आसनों से शारीरिक तथा आध्या-