ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआसन संबंधी सूचनायें
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स्मिक दोनों प्रकार के बल की वृद्धि होती है।
फर्श पर कंबल बिछाकर उस पर आसनों का अभ्यास करना चाहिये। शीर्षासन करते समय शिर के नीचे तकिया रखना चाहिये। आसन करते समय कौपीन (लंगोट) पहिने रहिये। चश्मा (पैन्क) उतार दीजिये और अधिक वस्त्र भी शरीर पर न रखिये।
जो लोग शीर्षासन का अभ्यास अधिक समय तक करते हैं, उनको आसन समाप्ति के पश्चात् कुछ जल-पान (कलेवा) कर लेना चाहिये अथवा कुछ दूध पी लेना चाहिए। आसनों का अभ्यास यथा-क्रम नियम-नियमानुसार करना चाहिये। जो कभी कभी अभ्यास करते हैं, उन्हें कुछ भी लाभ नहीं होता। यदि कोई आसनों का यथेच्छ लाभ उठाना चाहे, तो उसके लिये नियमित अभ्यास की परमावश्यकता है। साधारणतया लोग आरंभ में मास दो मास तक तो बड़े कौतूहल व उत्साह के साथ अभ्यास करते हैं और फिर अभ्यास छोड़ देते हैं। यह उनकी भारी भूल है।
आसनों का अभ्यास खाली पेट से करना चाहिये या खाना खाने के कम से कम तीन घंटे पश्चात्। आसनों का अभ्यास करते समय आप जप और प्राणायाम को भी सुविधा सहित भिला सकते हैं। उस स्थिति में वह वास्तविक योग बन जाता है। आसनों का अभ्यास खुली हवा में, समुद्र तट पर या नदी के किनारे बालू रेत पर करना उपयुक्त है। यदि आप आसन और प्राणायाम का अभ्यास किसी कमरे में करते हैं तो आपको देखना चाहिये कि कमरा संकुचित तो नहीं है। कमरा स्वच्छ और एवादार होना चाहिये।