ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ेंबन्ध त्रय
१२३
(६) मूल बन्ध
बाये पैर की एडी से योनि के दबाइये। गुदा को सिकोड़िये। दाहिने पैर की ऐंडी को सिगोन्द्रिय के मूल में रखिये। यह मूल बन्ध है। साधारणतया यह प्राणायाम करते समय किया जाता है।
(७) जालन्धर बन्ध
कंठ को सिकोड़िये। उदृढ़ी को हृदतापूर्वक छाती से सटा दीजिये। इसका अभ्यास पूरक के अन्त में और कुम्भक के आरम्भ में करना चाहिये। इसके पश्चात् उड़ियान बन्ध करना चाहिये। ये बन्ध एक प्रकार से एक ही प्रयोग के तीन रूप हैं।
(८) उड़ियान बंध
मस्तक को ऊपर उठाइये। रेचक कीजिये और उदर को इस प्रकार अन्दर खींचिये कि वह वक्षस्थल की गुहा से जा लगे। इस बंध का अभ्यास खड़े खड़े किया जा सकता है। इस स्थिति में टाँगों को कुछ चौड़ी कर हाथों को नंधाओं पर रख कर कुछ आगे की ओर नीचे झुक जाइये। इन तीनों (मूल, जालन्धर, उड़ियान) बन्धों का एक अन्ध्या समन्वय है।