ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 237 में से
संदर्भ में पढ़ें१२५
महामुद्रा
पेट की दाहिनी बगल (ओर) को सिकोड़े रखिये और बांई बगल को मुक्त कीजिये पुनः बांई बगल को सिकोड़िये और दांई को मुक्त कीजिये। इस प्रकार शनैः शनैः अभ्यास करते हुये आप स्वयं जानने लगेंगे कि पेट के बीच के तथा दांई बांई ओर के पुट्ठे किस प्रकार सिकोड़े जाने चाहिये॥
अब नौली क्रिया की अन्तिम स्थिति आती है। पुट्ठों को बीच में रखिये। धीरे धीरे दांई ओर लाइये और फिर गोलाकार रूप में बाईं ओर ले जाइये। इस प्रकार दांई से बाईं और बाईं से दाईं ओर कई बार कीजिये। आपको चाहिये कि आप इन पुट्ठों को गोलाकार चाल से सदा धीरे धीरे चलावें। यदि आप क्रिया को शनैः शनैः सावधानी के साथ करेंगे तो आपको पूर्ण लाभ होगा। नये साधकों को आरंभ के दो या तीन अभ्यासों में पेट में कुछ दर्द प्रतीत हो सकता है। परन्तु उन्हें भयभीत नहीं होना चाहिये। दो या तीन दिनों के नियमित अभ्यास के बाद दर्द नहीं प्रतीत होगा।
(१०) महामुद्रा
भूमि पर बैठ जाइये। बांई एड़ी से गुदा को दबाइये दाहिने पांव को फैला दीजिये। दोनों हाथों से अंगुष्ठ को पकड़ लीजिये। पूरक करके कुम्भक कीजिए। ठुड्डी