भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

१२६

ब्रह्मचर्य साधना

को दृढ़ता पूर्वक छाती से लगा लीजिए। भुंकुटी पर दृष्टि जमाइए। जितना हो सके उतनी देर तक इस स्थिति में रहिए। इसी प्रकार अन्य पांख पर भी अभ्यास कीजिए।

(११) योगमुद्रा

पद्मासन लगाकर बैठ जाइए। हथेलियों को ऐंड़ियों पर रख दीजिए। धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए और सामने मुड़ते जाइए और मस्तक को भूमि से छूने दीजिए। यदि आर इस स्थिति में अधिक समय तक रहें तो साधारण रीति से स्वांस ले सकते हैं। यदि अधिक समय तक उस स्थिति में न रहें तो स्वांस को रोके रहिए जब तक आप धीरे धीरे मस्तक उठाते हुए अपनी साधारण स्थिति में न आ जायें; तब तक स्वांस पहली हालत में आकर स्वांस लीजिए। हाथों को ऐंड़ियों पर न रख कर आप उन्हें अपनी पीठ के पीछे लेजा कर, दाहिने हाथ से बाये हाथ की कलाई भी पकड़ सकते हैं। यह मुद्रा ब्रह्मचर्य के लिए लाभदायक है। इस मुद्रा से पेट का और अस्थायिक मोटापन कम होता है। तथा पेट और आंतों के सब प्रकार के रोग नष्ट होते हैं। जठराग्नि प्रबल होती है। भूल और पाचन शक्ति बढ़ती।

(१२) सरल सुखपूर्वक प्राणायाम

अपने ध्यान के कमरे में, खाली पेट पद्मासन लगा कर बैठ जाइये। आर्यों बन्द कर लीजिए। दाहिने हाथ के अंगुष्ठ के द्वारा दाहिनी नासिका को बंद कर लीजिये और बाईं नासिका के द्वारा धीरे धीरे वायु को भीतर खींचिए। अब दाहिने हाथ की अनामिका और कतिष्का अंगुलियों द्वारा बाये नासा-द्वार को बंद कर दीजिए। स्वांस को जितनी देर रोक सकें भीतर रोके रहिए। फिर