ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभक्तिका प्राणायाम
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दाहिने ग्रंणुष्ठ को हटा लीजिए और बहुत धीरे धीरे स्वांस बाहर निकालिए। इसी प्रकार पुनः दाहिने नासा-द्वार के द्वारा वायु को अन्दर खींचिए; जितनी देर रोक सकें अन्दर रोके रखिए फिर बांये द्वार से धीरे धीरे बाहर निकाल दें। यह सारा क्रम एक प्राणायाम कहलाना है। इस प्रकार २० प्राणायाम प्रातः और २० सार्धकाल में कीजिए। धीरे धीरे स्वांस रोकने के समय को मावधानी सहित बढ़ाइए; साथ ही प्राणायामों की संख्या को भी बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। जब आपको श्रद्धा अभ्यास हो जाय तो आप दिन में तीन या चार बार प्राणायाम कर सकते तथा प्राणायामों की संख्या भी एक बैठक में ८० तक बढ़ा सकते हैं।
नोटः—हाथ के ग्रंणुष्ठ के पास वाली ग्रंणुली को तर्जनी, उसके पास वाली यानी चिन्हली ग्रंणुली को मध्यमा उसके पास वाली को अनामिका तथा उसके पास वाली ग्रंणुली को कनिष्ठका कहते हैं।
(१३) भक्तिका प्राणायाम
प्रासन से बैठ जाइये। शरीर को सीधा खड़ा रखिये। मुँह बंद कर लीजिए। धीँकनी की नाई बीस बार तक खूब जोर जोर से पूरक और रेचक कीजिए। बीस पूरे होने पर फिर गहरी स्वांस लीजिए और धीरे धीरे बाहर निकालिये। यह एक चक्र है। योद्धा अवकाश लीजिए और फिर दूसरा चक्र कीजिए। तीन चक्र प्रातः और तीन चक्र सार्धकाल में कीजिये। यह बहुत शक्तिशाली अभ्यास है। ब्रह्मचर्य के लिए परम उपयोगी है। इस प्राणायाम को खड़े खड़े भी कर सकते हैं।