ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
(१४) प्राणायाम के संबंध में साधारण संकेत प्राणायाम के अभ्यास के पश्चात् तुरंत स्नान नहीं करना चाहिये। आद्य घंटे तक ठहर कर फिर नहाना चाहिये। शीघ्र ऋतु में केवल एक ही बार मातृकाल में प्राणायाम करें। यदि मस्तिष्क में कुछ ताप मालूम हो तो नहाने के पहिले शिर पर ठंडा तेल मसिये।
पूरक और रेचक सदा धीरे धीरे करने चाहिये। पूरक करते समय कुछ भी शब्द नहीं होना चाहिये। भक्षिका में भी जो शब्द हो, वह तीव्र होना चाहिये। केशल नासिका द्वारा ही स्वांस लेना चाहिये। नये साधक को कुछ दिनों के लिये बिना कुम्भक का केवल पूरक और रेचक ही करना चाहिये।
प्राणायाम करते समय पूरक, कुम्भक और रेचक इस त्वरी से करना चाहिये कि आपको किसी भी स्थिति में कुछ भी पीड़ा या स्वासावरोधन न हो। रेचक का समय आपको आवश्यकता से अधिक नहीं बढ़ाना चाहिये। यदि आप ऐसा करते हैं तो आपका श्रमला पूरक शीघ्रता पूर्वक होगा और आपका लय या ताल भंग हो जायगा।
कुम्भक का समय शनैः शनैः बढ़ाहये। प्रथम सप्ताह में चार सेकेंड, दूसरे सप्ताह में द सेकेंड और तीसरे सप्ताह में १२ सेकेंड के लिये कुम्भक कीजिये; इसी प्रकार जितना हो सके, समय बढ़ाते जाहये।
प्राणायाम करते समय ८% मंत्र का, गायत्री मंत्र का अथवा किसी भी अन्य मंत्र का मानसिक जप कीजिये। ऐसा भाव रखिये कि पूरक करते समय करुणा, क्षमा, प्रेम आदि सद्गुण आप में प्रवेश कर रहे हैं तथा रेचक करते समय आपके काम, कोष, द्वेष, लोभ आदि दुष्ट गुणों