भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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का क्षय हो रहा है। पूरक करते समय आप ऐसी भावना कीजिये कि आप लौकिक प्राण से शक्ति प्राप्त कर रहे हैं तथा आपका सारा शरीर अगाध, स्वच्छ प्राण शक्ति से परिपूर्ण हो रहा है। विशेष अस्वस्थ अवस्था में अभ्यास बन्द कर दीजिये।

(१५) अन्य प्रकार

सत्संग, आहार संबन्धी नियम, मिताहार, सात्विक भोजन, व्रत, दृष्टि परिवर्तन आदि उपरोक्त सभी बातें, हठ-योग, भक्तियोग, राजयोग और ज्ञानयोग के सभी विद्यार्थियों के लिये सामान्य रूप से लागू हैं। ब्रह्मचर्य संबन्धी आवश्यक हठयोगिक अभ्यास पहिले बताये जा चुके हैं।

नवधा भक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म निवेदन) के अभ्यास के द्वारा भक्त अपनी अशुद्ध भावनाओं का दमन कर अपने मन को सगुण ब्रह्म पर एकाग्र कर सकता है। भगवान की लीला या कथा का सुनना या शान्तों का अध्ययन करना श्रवण भक्ति है। भगवान के नाम का निरन्तर जप करना तथा उसका निरन्तर स्मरण करना, स्मरण भक्ति कहलाती है। भगवान के यश का गान करना, कीर्तन है। पत्र-पुष्पादि भेंट चढ़ाना, अर्चन है। भगवान के चरण कमलों की पूजा करना, पादसेवन है। भगवान से मित्रता करना, सख्य है। भगवान की निस्वार्थ भाव से सेवा करना, दास्य है। आत्म समर्पण ही आत्म निवेदन है। व्रत, अनुष्ठान, प्रार्थनायें, मानसिक पूजा, मर्मग्राह्य आदि के द्वारा भक्त काम, क्रोध व अन्य अशुद्ध वामनाओं से मुक्त होकर नित्य शान्ति, आनन्द और ज्ञान के पथ पर चल सकता है।

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