भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्ये साधना

यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के अभ्यास के द्वारा, राजयोगी कामवासना पर विजय प्राप्त कर अपनी यौगिक साधना में अग्रसर होता है।

आचारिक या धार्मिक पवित्रता के लिये यम और नियम आवश्यक हैं। अहिंसा, सत्य, अस्तेय ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह—ये यम कहलाते हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान—ये नियम हैं। मन, वचन और कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देना, अहिंसा है। सच्चे बोलना सत्य है। संग्रह या लोभ नहीं करना, अपरिग्रह है। अन्तर और वाक् शुद्धि को शौच कहते हैं। प्राप्त वस्तु में तृप्ति मानना ही सन्तोष है। तपश्चर्या कर शरीर को कष्ट देना, तप है। अपने कर्म फलों को भगवान् के अर्पण कर देना, ईश्वर प्रणिधान कहलाता है। इन्द्रियों को भोग-पदार्थों से हटाना, प्रत्याहार कहलाता है। इन्द्रियों मन से पृथक् हैं। यदि मन को सदा विषयों से हटाकर लक्ष्य पर लगाया जाय तो प्रत्याहार आप ही होने लगेगा। ब्रह्मचर्य रक्षण के लिये प्रत्याहार बहुत सहायता प्रदान करता है। 'चित्तवृत्ति निरोध' इस उक्ति के द्वारा साधक वृत्ति हीन अवस्था को प्राप्त करता है। मन से किसी भी धिन्वार को उत्पन्न नहीं होने देते।

ज्ञान योगी, वैराग्य, विवेक, शम, दम, तितिक्षा समाधान, उपरति, श्रद्धा, मुमुक्षुत्व, अवण्ण, मनन और निदिध्यामन के अभ्यास द्वारा पवित्र होता है। विषय-सुख-भोगों से उदासीन रहना, वैराग्य है। सत्य और असत्य, नित्य और अनित्य का विचार करते रहना ही विवेक है। मन की शान्ति को शम कहते हैं। त्याग उपरति है। सहनशीलता ही तितिक्षा है (शीत, उष्ण आदि सहन करना)

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