ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनिश्चय कीजिये और ध्यान कीजिये
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गुरु तथा शास्त्रों के वचनों में विश्वास रखना, अद्वा है। मन की सन्तुलित अवस्था, समाधान है। जीवन मरण के चक्र से मुक्त होने की तीव्र इच्छा को समुद्बल कहते हैं। ॐ का जप तथा शुद्ध अलिंग आत्मा का ध्यान करने से मन में कुत्सित विचार उत्पन्न नहीं होंगे। सब वासनायें नष्ट हो जायेंगी। साधक अपने मन को सदा विचार में पूर्णतया निमग्न रखता है।
वासनाओं का क्षय करके, राग-द्वेष को मन से निकाल करके, अपनी आवश्यकताओं को कम करके तथा तितिक्षा का अभ्यास करके यदि आप अपनी इच्छा या संकल्प-शक्ति को शुद्ध दृढ़ और अद्विग बना लेंगे तो आपका काम स्वयं भस्म हो जायगा। संकल्प-शक्ति काम का प्रबल शत्रु है।
अपने ध्यान के कमरे में अकेले बैठ जाइये। नेत्रों को थन्द कर लीजिये। उपर्युक्त नियमों को बार बार दुहराइये। अर्थात् भी ध्यान जमाइये। इन्हीं विचारों में अपने मन और बुद्धि को डुबो दीजिये। आपके सारे नस-नस इन विचारों से संदित होने चाहिये।
(१६) निश्चय कीजिये और ध्यान कीजिये
- (१) मैं शुद्ध हूँ ॐ
- (२) मैं अलिंग आत्मा हूँ ॐ
- (३) आत्मा काम तथा लिंग-रहित है ॐ ॐ ॐ
- (४) काम मानसिक विकार है; मैं इसका सान्नि ॐ ॐ ॐ ॐ
- (५) मैं अंतर्ग हूँ ॐ ॐ ॐ
- (६) मेरा संकल्प शुद्ध दृढ़ और अद्विग है ॐ ॐ ॐ
- (७) मैं पूर्णरूप से शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य में संविधत हूँ ॐ ॐ ॐ