भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य साधना

मैं ठंडी हवा के भोंके सहन नहीं कर सकता मैं भीतर सोना चाहता हूँ।” उसने द्वार खोल दिया। जैमिनी भीतर आकर स्त्री से कुछ दूरी पर सो गया। स्त्री के अत्यन्त निकट होने तथा उसके कंकन व नूपुरों की मधुर मधुर भनकार कानों में पड़ने से अब उसकी काम-वासना कुछ और अधिक प्रबल हो गई। तब वह उठा और उसे आलिंगन करने लगा। तत्काल लंबी दाढ़ी युक्त श्री व्यास मुनि अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गये और कहने लगे “ओ वत्स ! जैमिनी ! अब तुम्हारे उस पूर्ण ब्रह्मचर्य का बल कहाँ गया ? जब मैं उस समय ब्रह्मचर्य के विषय पर प्रवचन कर रहा था, तब तुमने क्या कहा था ?” जैमिनी ने अतिशय लज्जा के कारण शिर नवा कर कहा “हे गुरुदेव ! मैं अधर्मी हूँ। कृपया क्षमा कीजिये।” इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है कि बलवती इन्द्रियों के प्रभाव तथा माया की शक्ति के द्वारा बदे बदे महा पुरुष भी धोखा खा जाते हैं। ब्रह्मचारियों को चाहिये कि वे प्रत्येक अवस्था में पूरे पूरे सावधान रहें।

(२) गुरुदेव मुनि

चित्त की एकाग्रता की जांच

श्री गुरुदेव जी ब्रह्मवान प्राप्त करने के हेतु राजा जनक के पास गये। राजा जनक ने उनकी धारणा (चित्त की एकाग्रता) शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। उसने गुरुदेव जी को बुलाकर कहा 'हे ऋषि राज ! लीजिये यह एक पानी से भरा दुग्ध कटोरा है। इसे अपने मस्तक पर रख लीजिये और सारी मिथिला नगरी का चक्कर काट कर पुनः मेरे पास यहाँ आ जाइये, परन्तु ध्यान रहे कि पानी

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