ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंराजा ययाति
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की एक बूंद भी पृथ्वी पर नहीं गिरनी चाहिये।’ राजा जनक ने उनके मार्ग में सुन्दर युवतियों के नाच, गान, वाद्य तथा नाना प्रकार के खेल, तमाशों की रचना करने का पहिले ही से प्रबन्ध कर दिया था ताकि उनका ध्यान किसी न किसी प्रकार से अवश्य विचलित हो जाय। सुख देव मुनि उस पानी के कटोरे को अपने शिर पर रक्खे हुए सारी नगरी में घूमकर पुनः ज्यों के त्यों राजा के पास लौट आये, पानी की एक बूंद भी गिरने न पाई।
राजा जनक ने पूछा “हे सुकदेव जी ! क्या आपने रास्ते में नाच गान आदि देखे ?” सुकदेव जी ने उत्तर दिया “हे मान्यवर ! मैंने रास्ते में कुछ भी नहीं देखा क्योंकि मेरा सम्पूर्ण ध्यान पानी के कटोरे पर था।”
दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध गृहस्थ ज्ञानी तिरुवल्लुवर ने भी अपनी पत्नी की परीक्षा इसी प्रकार से ली थी। यदि आप सुकदेव जी की भांति चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य सदा करवद्ध होकर आपके गृह-द्वार पर खड़ा रहेगा।
(३) राजा ययाति
इसकी कथा आपको महाभारत—शान्ति पर्व में मिलेगी। यद्यपि राजा ययाति वृद्ध हो गया था, तथापि उसकी काम वासना अति प्रबल थी। उसने अपने पुत्र को बुला कर कहा “हे वत्स ! मैं उत्कट अनुरागी हूँ। मैं छः नवयुवती कन्याओं से विवाह करना चाहता हूँ। मुझे तुम्हारा यौवन दो।” पुत्र ने पिता की आज्ञा स्वीकार कर ली और उसने अपना यौवन पिता को दे दिया। राजा ने कई वर्षों तक घाटियों, नालियों, कगीचों, समुद्र