भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

तट तथा पर्वतों में उन नव विवाहिता पत्नियों के साथ खूब मनमानी कीड़ा, भोग विलासादि किये। अब भी यह अत्यन्त कामी और अशान्त था। उसके मन में तनिक भी शान्ति नहीं आई। अन्त में वह फूट फूट कर रोने लगा और अपने पुत्र को बुला कर दुख भरे शब्दों में कहने लगा “हे वत्स ! मैंने इन स्त्रियों के संग अर्हनिश भोग विलास किया; मैंने अपना सारा जीवन ही नष्ट कर डाला है, परन्तु मेरी काम-वासना अभी तक नष्ट नहीं हुई है। जिस प्रकार अग्नि में घृत या तेल की आहुति देने से वह अग्नि अधिक प्रज्वलित होती है, ठीक उसी प्रकार से यह काम भोग-विलास के द्वारा अधिक प्रबल तथा उत्तेजित होता है। भोगों से कभी भी वासनाओं की तृप्ति नहीं हो सकती। तृष्णा और संस्कारों के बल के द्वारा, भोग मनुष्य के मन को और भी अधिक अशांत बना देता है। अब मैं प्रत्येक वस्तु का सर्वतः त्याग करता हूँ। अब मैं संन्यास लेकर बनों में भ्रमण कर ब्रह्मचर्य व ध्यान का अभ्यास करूँगा।” केवल तप, सत्य, ब्रह्मचर्य और ध्यान के द्वारा ही शान्ति और अमरत्व प्राप्त हो सकता है। श्रुतियों की घोषणा है कि मनुष्य केवल त्याग ही के द्वारा अमरत्व प्राप्त कर सकता है, न कि धन और कर्मों से।

(४) सुकरात और उसका शिक्षण

(ब्रह्मचर्य संबंधी संभाषण)

सोक्रैटीज के एक शिक्षण ने पूछा “हे पूज्य गुप्तदेव ! मुझे यह बतलाइये कि गृहस्थी को कितना बार स्त्री-प्रसंग करना चाहिये।” सुकरात ने उत्तर दिया “जीवन भर में केवल एक बार।”