भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

राजा ययाति

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की एक बूंद भी पृथ्वी पर नहीं गिरनी चाहिये।’ राजा जनक ने उनके मार्ग में सुन्दर युवतियों के नाच, गान, वाद्य तथा नाना प्रकार के खेल, तमाशों की रचना करने का पहिले ही से प्रबन्ध कर दिया था ताकि उनका ध्यान किसी न किसी प्रकार से अवश्य विचलित हो जाय। सुख देव मुनि उस पानी के कटोरे को अपने शिर पर रक्खे हुए सारी नगरी में घूमकर पुनः ज्यों के त्यों राजा के पास लौट आये, पानी की एक बूंद भी गिरने न पाई।

राजा जनक ने पूछा “हे सुकदेव जी ! क्या आपने रास्ते में नाच गान आदि देखे ?” सुकदेव जी ने उत्तर दिया “हे मान्यवर ! मैंने रास्ते में कुछ भी नहीं देखा क्योंकि मेरा सम्पूर्ण ध्यान पानी के कटोरे पर था।”

दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध गृहस्थ ज्ञानी तिरुवल्लुवर ने भी अपनी पत्नी की परीक्षा इसी प्रकार से ली थी। यदि आप सुकदेव जी की भांति चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर लेंगे तो ब्रह्मचर्य सदा करवद्ध होकर आपके गृह-द्वार पर खड़ा रहेगा।

(३) राजा ययाति

इसकी कथा आपको महाभारत—शान्ति पर्व में मिलेगी। यद्यपि राजा ययाति वृद्ध हो गया था, तथापि उसकी काम वासना अति प्रबल थी। उसने अपने पुत्र को बुला कर कहा “हे वत्स ! मैं उत्कट अनुरागी हूँ। मैं छः नवयुवती कन्याओं से विवाह करना चाहता हूँ। मुझे तुम्हारा यौवन दो।” पुत्र ने पिता की आज्ञा स्वीकार कर ली और उसने अपना यौवन पिता को दे दिया। राजा ने कई वर्षों तक घाटियों, नालियों, कगीचों, समुद्र

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ब्रह्मचर्य साधना

तट तथा पर्वतों में उन नव विवाहिता पत्नियों के साथ खूब मनमानी कीड़ा, भोग विलासादि किये। अब भी यह अत्यन्त कामी और अशान्त था। उसके मन में तनिक भी शान्ति नहीं आई। अन्त में वह फूट फूट कर रोने लगा और अपने पुत्र को बुला कर दुख भरे शब्दों में कहने लगा “हे वत्स ! मैंने इन स्त्रियों के संग अर्हनिश भोग विलास किया; मैंने अपना सारा जीवन ही नष्ट कर डाला है, परन्तु मेरी काम-वासना अभी तक नष्ट नहीं हुई है। जिस प्रकार अग्नि में घृत या तेल की आहुति देने से वह अग्नि अधिक प्रज्वलित होती है, ठीक उसी प्रकार से यह काम भोग-विलास के द्वारा अधिक प्रबल तथा उत्तेजित होता है। भोगों से कभी भी वासनाओं की तृप्ति नहीं हो सकती। तृष्णा और संस्कारों के बल के द्वारा, भोग मनुष्य के मन को और भी अधिक अशांत बना देता है। अब मैं प्रत्येक वस्तु का सर्वतः त्याग करता हूँ। अब मैं संन्यास लेकर बनों में भ्रमण कर ब्रह्मचर्य व ध्यान का अभ्यास करूँगा।” केवल तप, सत्य, ब्रह्मचर्य और ध्यान के द्वारा ही शान्ति और अमरत्व प्राप्त हो सकता है। श्रुतियों की घोषणा है कि मनुष्य केवल त्याग ही के द्वारा अमरत्व प्राप्त कर सकता है, न कि धन और कर्मों से।

(४) सुकरात और उसका शिक्षण

(ब्रह्मचर्य संबंधी संभाषण)

सोक्रैटीज के एक शिक्षण ने पूछा “हे पूज्य गुप्तदेव ! मुझे यह बतलाइये कि गृहस्थी को कितना बार स्त्री-प्रसंग करना चाहिये।” सुकरात ने उत्तर दिया “जीवन भर में केवल एक बार।”

सुकरात और उसका शिष्य

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शिष्य ने कहा "हे देव ! सांसारिक मनुष्यों के लिये यह सर्वथा असंभव है। काम अति भयंकर और दुःखदाई है। संसार में अनेकानेक आकर्षण और प्रलोभन हैं। हैं। ग्रहस्थियों में इतनी शक्ति नहीं है कि वे प्रलोभनों को जीत सकें। उनकी इन्द्रियां बड़ी प्रबल और उत्तेजित हैं। मन में काम-वासना भरी रहती है। आप तो ज्ञानी और योगी हैं। आपकी इन्द्रियां आपके वश में हैं। कृपया ग्रहस्थियों के लिए कोई सुगम मार्ग बतलाइये। इस पर सुकरात ने कहा "ग्रहस्थी वर्ष में एक बार स्त्री-प्रसंग कर सकता है।" शिष्य ने फिर कहा "हे गुरुदेव ! वह भी उनके लिये एक कठिन कार्य है। इससे भी कोई सरल मार्ग बतलाये।" सुकरात ने कहा "अच्छा तो महीने में एक बार। यह अति सरल और अनुरूप है। क्यों ? अब तो तुम संतुष्ट हो न।" शिष्य ने कहा "हे गुरुवर्ष ! यह भी असंभव है। ग्रहस्थियों के मन बड़े चंचल होते हैं। उनमें कामुक संस्कार और वासनायें पूर्णतः भरी रहती हैं। वे स्त्री-प्रसंग किये बिना एक दिन भी नहीं रह सकते। आपको उनकी मानसिक अवस्था का पता नहीं है।" इस पर सुकरात ने कहा "अच्छा तुम्हारा कहना ठीक है। अब एक काम करिये। (प्रमशान) कम्बिस्तान में जाकर कन्न खोद डालिये और पुनः कफन भी पहले ही से खरीद रखिये। फिर आप अपनी इच्छानुसार भोग करें अपने आपको नष्ट कर सकते हो। यही मेरा अन्तिम उपदेश है।"

इस अन्तिम उपदेश ने शिष्य का हृदय विदीर्ण कर डाला। उसके अत्यन्त गहरी चोट लगी। उसने इस पर गंभीरता पूर्वक विचार किया और तदनुसार वह ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य साधना

की आवश्यकता तथा उसके महत्व को समझ गया। ठीक उसी समय से उसने सौत्ताह आध्यात्मिक साधना प्रारंभ कर दी। उसने जीवन पर्यन्त अखंडित ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने की दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली। उसने उर्ध्वरेता योगी बन कर आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लिया। वह तब से सुकरात के प्रिय शिष्यों में एक गिना जाने लगा।

(५) एक पिशाच (भूत) की कहानी

मन ही पिशाच है, जो नित्य अशांत रहता है। एक बार एक ब्राह्मण पंडित ने मंत्र-सिद्धि के द्वारा किसी पिशाच को बस में कर डाला। पिशाच ने पंडित से कहा “मैं प्रत्येक कार्य एक ही मिनट में कर सकता हूँ। मेरे पास अलौकिक शक्तियाँ हैं। आप मुझे नित्य विविध प्रकार के कार्य करने के लिये देते रहिये। यदि बिना काम के एक मिनट भी मुझे छोड़ा, तो याद रखिये मैं आप ही को तत्काल भस्म कर जाऊँगा।” ब्राह्मण ने इस बात को स्वीकर कर लिया। उस पिशाच ने ब्राह्मण के लिये एक तालाब खोदा, हल चलाया और थोड़े ही समय में विविध प्रकार के अनेक कार्य कर डाले। अब उस के पास कुछ भी कार्य शेष नहीं रहा जिसमें वह उस देव को लगा सके। देव ने ब्राह्मण को डाट कर कहा “अब मेरे लिये कुछ भी नहीं है; मैं आप ही को भस्म करूँगा।” ब्राह्मण व्याकुल होकर असमंजस में पड़ गया। वह कुछ भी नहीं जान सका कि अब उसे क्या करना चाहिये। वह अपने गुरुजी के पास गया और सब हाल कह सुनाया। गुरुजी ने कहा “अपनी साधारण बुद्धि से काम लो। अपने घर के सामने एक लूँवा, मजबूत लकड़ी का स्थंभ खड़ा कर दो

शुद्ध और अशुद्ध मन

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और उस पर लिह्ली का तेल अथवा अन्य कोई भी चिकना पदार्थ लेप दो । फिर उस देव को उस स्थंभ पर अह-निश चढ़ने और उतरते रहने की आज्ञा दो ।” शिष्य ने वैसा ही किया और तदनुसार उस पिशाच को तुरत वस में कर लिया । देव असहाय हो गया ।

(६) शुद्ध और अशुद्ध मन

एक बार बनारस में हनुमान घाट पर दो कुमारिकायें, जो वहाँ स्नान कर रही थीं सहसा पानी में डूबने लगीं । दो नव युवक जो वहाँ पर खड़े थे तुरंत गंगा में कूद पड़े और उन कन्याओं को पानी से निकाल कर उनकी जान बचा दी । एक मनुष्य ने कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट की तूसे मनुष्य ने कहा “मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया है । भगवान ने मुझे सेवा करने तथा अपने आप को समुन्नत करने का सुश्रवसर प्रदान किया है ।” यह है चित्त शुद्धि । वाद्य कार्य-जान बचाने का—तो दोनों पुरुषों का एक ही है, परंतु उद्देश्य में भेद है । फल भी भिन्न होंगे ।

—10:—

परिशिष्ट

(१) ब्रह्मचारी का गीत

विवाह एक अभिशाप तथा आजन्म कारावास है; मैं उस अविवाहित परमानंद का प्रेमी हूँ जो धैर्य और शान्ति का देने वाला है।

ओ ! अनुरागी ग्रहस्थियों ! आप इस बहुमूल्य वीर्य को क्यों नष्ट करते हैं ?

रक्त की चालीस बूंदों से वीर्य की एक बूंद बनती है, सावधानीपूर्वक उसकी रक्षा कीजिये और उसे थोड़ में परिणत कीजिये।

क्या आप इस अशिष्ट कार्य को पुनः करते रहने में लज्जित नहीं होते ?

ए मेरे प्यारे मित्रो ! अब जरा मेरी गाथा सुनिये।

(१४२)

ब्रह्मचारी का गीत

१४३

मैं निःशंक नैष्ठिक ब्रह्मचारी हूँ ।

मैंने बचपन ही से अखंड ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले रखी है ।

मैं भीष्म, लक्ष्मण, सनक, सनंदन, सनतसुजात और सनत कुमार का वंशज हूँ ।

मैं अखंड ब्रह्मचारी के नाम से भी प्रख्यात हूँ,

कोई कोई मुझे बाल ब्रह्मचारी भी कहते हैं,

मैं इन नामों की ओर ध्यान भी नहीं देता, क्योंकि वे असत्य हैं ।

मैंने दर्शन, केलि, कीर्तन, गुह्यभाषण, संकल्प, अध्ययसाय और क्रिया-निवृत्ति इन आठ प्रकार के अवरोधों (विध्वंशों) का परिहार किया है ।

जब मैं रास्ते में चलता हूँ तो सदा अपने पैर के अंगूठे की ओर ही देखता रहता हूँ ।

मैं स्त्रियों को और काम-दृष्टि से नहीं भांकता,

मैं शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य में सुव्यवस्थित हूँ ।

मैं पौष्प और शक्ति-शाली उर्ध्वरेता योगी हूँ ।

मैं शीर्षासन और सर्वांगासन भी किया करता हूँ ।

मैं भगवत् चिंतन के लिये सिद्धासन पर बैठता हूँ।

मैं बंध और मुद्राओं में भी प्रवीण हूँ ।

मैं नौली और बज्रौली भी सरलता पूर्वक कर सकता हूँ ।

मैं अधिक समय के लिये अपने प्राण का अवरोध कर सकता हूँ ।

मैं उसे तुरंत अपनी हृच्छानुसार सहस्रार में ले जा सकता हूँ ।

मैं नित्य अपने सच्चिदानंद स्वरूप में स्थित रहता हूँ ।

मैं शान और जीवन की एकता का अनुभव करता हूँ ।

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ब्रह्मचर्य साधना

में मर्त्य-प्रकार के प्रलोभनों से अजेय हूँ।

में अपनी महती इच्छा-शक्ति के द्वारा पर्वतों का उन्मूलन कर सकता हूँ;

में क्षण भर में समुद्रों का शोषण कर सकता हूँ;

में ऐक्चरी मुद्रा द्वारा आकाश में उड़ सकता हूँ;

में अपनी अंगुलियों द्वारा सूर्य को भी स्पर्श कर सकता हूँ;

रिषियों और सिद्धियों तो अब मेरे चरणों में जुड़कती हैं।

में गर्म कढ़ी और चटनियों का त्याग करता हूँ;

में दूध, फल, और गेहूँ की रोटी द्वारा अपना जीवन यापन करता हूँ;

मैंने चल-चित्रों, उपन्यासों तथा कुसंगति का सर्वथा त्याग कर दिया है;

मैं महात्माओं के संग में रहता हूँ तथा जप, ध्यान करता हूँ;

मैं निःश्व प्रातःकाल ब्राह्ममूर्त में तीन या साढ़े तीन बजे उठता हूँ;

और अद्वा, प्रेम और भाव के साथ भगवान का चिंतन करता हूँ;

मैं एकान्त में, हिमगिरि की कंदराओं में रहना पसंद करता हूँ;

गंगा तट पर वास करने से मेरे मन में ईश्वर-प्रेरणा का संचार होता है;

मैं सदा सर्वथा कर्म में संलग्न ही रहता हूँ;

कुसित विचारों को दूर रखने के लिये यह सर्वभेद साधन है;

ब्रह्मचर्य क. पुस्तक

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आलस्य और मन की अस्थिरता—ये दो बड़े भारी विघ्न हैं;

प्राणायाम और कार्य-संलग्न-स्वभाव के द्वारा मार्ग नितान्त स्पष्ट रहता है ।

मेरा शरीर कमल-पुष्प की भांति सुगंधित है;

मेरे नेत्र हीरक की भाँति प्रकाश मान हैं;

मेरा शरीर हल्का और मल त्याग अत्यंत है;

मेरी बाष्पी बुलंद (प्रबल) तथा मेरा स्वर कोकिल कंठ की भांति मधुर है;

ब्रह्मचर्य व्रत ही इन सब का कारण है,

आप लोग भी इस महाम्रत को क्यों नहीं धारण करते ?

(२) ब्रह्मचर्य के नुस्खे

(१) ीर्वासन....५ मिनट
सर्वांगसन....१० ”
मत्र (एकादशी अथवा हर दूसरे इतवार को)
जप....१ घंटा
गीता का अध्ययन....१ ”
सगुण या निर्गुण ध्यान....३० मिनट

(इसे दो घंटों तक बढ़ाइये)

(२) सिद्धान्त....३० मिनट
प्राणायाम....३० ”
दूध और पल....रात्रि में
उठियान वन्द्य....१० मिनट

(मन को पढ़ने, यगीचा लगाने, कीर्तन करने आदि कार्यों में सदा पूर्णतः लगाये रखना चाहिये)

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ब्रह्मचर्य साधना

(३) कीर्तन....३० मिनट
प्रार्थना....३० "
मत्संग....॥ घंटा
ध्यान....३० मिनट से ३ घंटे
त्रिफला का पानी...प्रातःकाल में

(४) ॐ या भगवान् कृष्ण के चित्र पर जाटक करना

१० मिनट

द्वारे राम कीर्तन और जप ..... ३० मिनट

( वादाम और मिश्री-शर्बत, शीष्म ऋतु में लेना चाहिए )

जप के लिये मन्त्र

विष्णु भक्तों के लिये ... ॐ नमो नारायणाय

शिव भक्तों के लिये ... ॐ नमः शिवाय

भगवान् कृष्ण के भक्तों के लिये ॐ नमो भगवते

वासुदेवाय

भगवान् राम के भक्तों के लिये श्रीराम.या श्री सीताराम

द्विजो (ब्राह्मण, दक्षिण और वैश्यो) के लिये गायत्री

मंत्र निर्गुण उपासकों के लिये ... ॐ या सोऽहम्

नोट:—थाप उपयुक्त चार वर्गों (समूहों) में से

किसी भी एक वर्ग के विषयों का अभ्यास कर सकते हैं

या वर्ग १ और ३ या ४ या १. २. ३. और ४ को अपने

सुविधा के अनुसार मिला सकते हैं।

ब्रह्मचर्य माला

ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ तप है। विष्णुद्ध ब्रह्मचारी मनुष्य नहीं अपितु साक्षात् देवता है। जो यज्ञ पूर्वक अपने वीर्य की रक्षा करता है, उस ब्रह्मचारी के लिये इस संसार में क्या अप्राप्य है? वीर्य की शान्ति रूपी शक्ति के द्वारा कोई भी ब्रह्मचारी मेरे समान बन सकता है। —शंकर

ब्रह्मचर्य माला

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जो विद्यार्थी ब्रह्मचर्य के द्वारा भगवान् के लोक को प्राप्त कर लेते हैं, फिर उन के लिये ही वह स्वर्ग है। वे किसी भी लोक में क्यों न हों, मुक्त हैं।

—छादोग्य उपनिषद्

इंद्रिय-मुख के द्वारा, जीवन, कान्ति, बल, पौरुष, स्मरण शक्ति, धन, कीर्ति, पवित्रता तथा भक्ति, इन सब का सर्वथा नाश होता है।

—भगवान् श्रीकृष्ण

ब्राह्मण किसी भी नंगी स्त्री का दर्शन न करे

—मनु

भोजन में सावधानी रखना त्रिगुण मूल्यवान है, परंतु मैथुन में दूर रहना एक नौगुना महत्व शाली कार्य है। सन्यासी कभी किसी स्त्री की ओर काम इष्टि से न देखे; यह नियम उसके लिये पहिले ही से चलता आ रहा है और आगे भी मद्दा चलता रहेगा।

—आत्रेय.

बुद्धिमान् मनुष्य को चादिये कि वह विवाह न करे; विवादित जीवन को एक प्रकार का दमकते हुए अंगारों से परिपूर्ण खड्ड समझे। संयोग या संसर्ग से इंद्रिय जनित ज्ञान की उत्पत्ति होती है; इंद्रिय जन्मित ज्ञान से तत्संबंधी मुख को प्राप्त करने की अभिलाषा दृढ़ होती है; संसर्ग से दूर रहने पर जीवात्मा सब प्रकार के पापमय जीवन से मुक्त रहना है।

—बुद्ध

मनसे, यत्न से और शरीर से, सर्व कर्मों में, सर्वध्या, सर्वग मैथुन से मुक्त रहना ही ब्रह्मचर्य है। —याज्ञवल्क्य

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ब्रह्मचर्य साधना

धनवानों, नास्तिकों तथा शत्रुओं तथा काम के संबंधी धार्तालाप कभी अवश्य न कीजिये ।

—नारद

शरीर से वीर्य-पात होने पर मृत्यु का शीघ्रगमन होता है; वीर्य की रक्षा करने से जीवन की रक्षा व आयु की वृद्धि होती है ।

वीर्य-पतन से ही अकाल मृत्यु होती है, इस में संदेह नहीं; इस बात को ध्यान में रखते हुए योगी को चाहिये कि वह वीर्य की सदा रक्षा करे और पूर्ण पवित्रता का जीवन व्यापन करे ।

—शिव संहिता

मैथुन संबंधी ये प्रवृत्तियाँ, सर्व प्रथम तो तरंगों की भांति ही प्रतीत होती हैं, परंतु आगे चलकर वे कुसंगति के कारण एक विशाल समुद्र का रूप धारण कर लेती हैं ।

—नारद

वेद के जानने वाले विद्वान जिस को ऊँच कार नाम से कहते हैं, और आसक्ति रहित सन्यासीगण जिस में प्रवेश करते हैं तथा जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिये संक्षेप में कहूँगा ।

—गीता अध्याय ८. श्लो-२

जो पुरुष कर्मैन्द्रियों को हठपूर्वक रोक कर, इंद्रियों के गोरों को मन से चिंतन करता रहता है वह मूढ़बुद्धि, मिथ्याचारी शर्मान् दग्भी कहा जाता है ।

—गीता अध्याय ३. श्लोक ६.

शान्त निच, भय रहित, ब्रह्मचर्य के त्रत में स्थित, मन

ब्रह्मचर्य माला

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को वश में करके मेरे में लगे हुए चित्तवाला, मेरे परायण हुआ स्थित होते।

—गीता, अध्याय ६. श्लोक १८.

बुद्धि, विशेषतः स्मरणशक्ति की दुर्बलता, दुराचारियों की मानसिक दुर्बलता का लक्षण है।

—डाकर लुइम.

भीष्मपितामह धर्म-पुत्र युधिष्ठिर से कहते हैं “ह राजन् ! जो मनुष्य आजन्म पूर्ण ब्रह्मचारी रहता है, उसके लिये, इस संसार में, कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जो वह न प्राप्त कर सके। एक मनुष्य चारों वेदों का जानने वाला है, और दूसरा पूर्ण ब्रह्मचारी है; इन दोनों में ब्रह्मचारी ही श्रेष्ठ है।”

—महाभारत

(४) शाहंशाह की झँगूठी—एक सलाहकारी मित्र

(वैराग्य की वृद्धि कीजिये)

एक बार परसिया में एक राजा राज्य करता था.

जिसके पास एक राजकीय झँगूठी थी,

उस पर एक विवेकयुक्त अनोखा सिद्धान्त खुदा हुआ था.

ज्यों ही वह उसे अपने नेत्रों कैसामने लेता

ज्यों ही वह उसे तत्काल एक

यभोन्मित, समयानुबल सम्मति देती,

वे थे पवित्र शब्द और वे थे हैं,—

“यह भी गुजर जायगा”

ऊंटों के कफिले गेतीले मैदानों से होकर.

ममरुंद से उसके लिये बहुमूल्य रत्न लाती था;

नौका ममुदाय के द्वारा समुद्रों की राह से.

१५०

ब्रह्मचर्य साधना

उसके लिये अनमोल मोती आने थे; परंतु वह इस धन-निधिको तुच्छ ही समझता, तथा उसको अपनी न जान कर कुछ भी महत्व नहीं देता; वह तो केवल यही कहता “यह धन किस काम का है ?” “यह भी गुजर जायगा ।”

अपने रागजह में भोग-विलासावस्था में, असीम आनंद के अवसर पर भी, जब उसके अतिथि तथा मित्रवर्ग, तालियाँ बजा कर दिल्ली उड़ाते वह यही कहता “ए मेरे प्यारे मित्रों ! सुख (भोग) आते हैं, पर सदा के लिये नहीं, “यह भी गुजर जायगा ।”

अनुपम सुंदर स्त्री जो कभी देखने में न आईं हो, उसकी विवाहिता राज-रानी थी, विवाह की सुख-रौशना पर लेटे हुए भी, उसने धीरे से अपनी आत्मा से कहा :— यदिपि किसी भी राजा ने आज तक, ऐसी सुंदरी युवति का आलिंगन नहीं किया है, तथापि यह मृतक शरीर केवल मिट्टी है- “यह भी गुजर जायगा” ।

भीषण रणक्षेत्र में युद्ध करते हुए, एक बार शत्रुके भाले से उसका ढाल बिंद गया; उच्चस्वर से विलाप करते हुए उसके सिपाही, उसके संधर सिक्त शरीर को डेरे पर ले आये, पीड़ा की वेदना के कारण विलाप करते हुए, उसने कहा “पीड़ा असह्य है”

परंतु, धैर्य के साथ, धीर धीरे,

क्या स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है ? १५१

“यह भी गुजर जायगा” ।

आम रास्ते पर एक मीनार में,

जो प्रायः बीस गज ऊँची थी;

उसकी एक पत्थर की मूर्ति प्रतिष्ठित थी

राजाने एक दिन अज्ञात छिपेवेश में,

जब देखा अपने अंकित नाम को

तो बिचार किया “कीर्ति क्या है” ।

यश भी शनैः शनैः नष्ट होने वाला है—

“यह भी गुजर जायगा” ।

पद्माघात से ग्रस्त, अशक्त, वृद्ध वह राजा,

स्वर्णद्वारों पर प्रतीक्षा करता हुआ,

अपने अंतिम स्वास द्वारा कहने लगा,

“जीवन तो समाप्त हुआ, पर मृत्यु क्या है ?”

तब उसके उत्तर में,

उसकी अंगूठी पर एक प्रकाश पड़ा,

वह दिव्य प्रकाश यही बताता गया,

“यह भी गुजर जायगा” । —थियोडोर टिल्टन

(५) क्या स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है ?

प्रश्नः—वीर्य की उत्पत्ति तथा उसके लय संबंधी सिद्धान्त जो पुरुषों को लागू होते हैं ? क्या वे ही सिद्धान्त स्त्रियों को भी लागू होते हैं ? क्या वे भी वास्तव में उसी प्रकार प्रभावित होती हैं जिस प्रकार कि मनुष्य ?

उत्तरः—आप का प्रश्न महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है । हाँ, मनुष्य की भौति, मैथुन से स्त्री का शरीर शून्य होता है तथा उसकी शक्ति भी क्षीण होती है । नाकी गंडल पर भी उसका प्रभाव वास्तव में बहुत तीव्र पड़ता है । स्त्रियों के अंडाशयों (जो पुरुषों के तत्स्थानी होते हैं) में वीर्य

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ब्रह्मचर्य साधना

की भाँति, एक प्रकार की बहुमूल्य प्राण या जीव-शक्ति उत्पन्न होकर परिपक्व होती है। इस जीवन-शक्ति का नाम रज है। यद्यपि यह रज वास्तव में स्त्री के शरीर से वाहिर तो नहीं आता (जैसे कि पुरुष का वीर्य) तथापि मिथुन-क्रिया के कारण वह अंडाशय को छोड़ गर्भाधान की प्रक्रिया में नियुक्त होता है। गर्भवती स्त्री को जो पीड़ा होती है वह कोई नहीं जान सकता, क्योंकि कहा है “प्रसूति की पीड़ा प्रसूति ही जानें”। इस शक्ति के चार चार क्षीण होने तथा प्रसव पीड़ा के कारण दुःखील और स्वस्थ स्त्रियाँ भी अस्थि-पंजर बन जाती हैं। इस से उन के बल, रूप, लावण्य, जीवन तथा उनकी मानसिक शक्ति पर अति विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। अतिरिक्त शक्तियों के क्षीण होने से तथा नैत्र, में चमक, नहीं रहती नेत्र-दृष्टि कम होजाती है।

विषय-भोग की इंद्रियजन्य तीव्र उत्तेजना के कारण नाड़ी मंडल प्रभावित होता है तथा दुर्बलता आ जाती है स्त्रियों के शरीर अधिक कोमल और लचीले होने के कारण, उन पर प्रायः पुरुषों से भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है उन्हें भी चाहिये कि वे अपनी बहुमूल्य शक्ति को क्षीण न होने दें।

अंडाशयों से खाचित जो रजादि रस हैं वे स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक पुष्टि के लिये अत्यंत आवश्यक हैं।

(६) उत्पत्ति आवरोध (जन्म-निरोध) की विधि माहात्मा गांधी जी अपने “हरिजन” में लिखते हैं:- आज हमारे समाज में ऐसी कोई भी बात नहीं है जो हमें जन्म-निरोध की विधि की ओर प्रवृत्त करे। हमारी प्रारम्भिक शिक्षा ही उसकी किरीडी है। आजकल माता

आत्मनिग्रह की विधि

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पिताओं का मुख्य कर्तव्य यही होता है कि वे अपने बच्चों का जैसे तैसे ही विवाह कर दें ताकि वे शाशकों की भांति संतानोत्पत्ति कर कुल वृद्धि करते रहें। यदि वे कन्याएं हैं तो शीघ्राति शीघ्र विवाह दी जाती हैं चाहे उन की धार्मिक शिक्षा कैसी ही क्यों न हो। आजकल की विवाहोत्सव-विधि एक दीर्घ संताप है जिस में केवल अन्धे भोजन तथा निरर्थक व्यापार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यहस्थी का जीवन भूत पूर्व जीवन ही के आधार पर निर्धारित है। वह आत्म भोग-विलास का विस्तार है। छुट्टियाँ तथा आनंदोपभोगों के सामाजिक त्योहार भी ऐसे बनाये गये हैं जिन में विषयी जीवन-यापन करने में विवस होने की अधिकाधिक संभावना रहती है। शिक्षा ही ऐसी दी जाती है जो मनुष्य को पशु जीवन की ओर ले जाने में सहायता प्रदान करती है। अधिकतम अर्वाचीन शास्त्र-ज्ञान-प्रणाली के अनुसार विषय भोग करता कर्तव्य है तथा उस से परे रहना पाप है।

आत्मनिग्रह की विधि

इस में कोई आश्रय नहीं कि कामवासना पर विजय प्राप्त करना एक प्रकार का असंभव सा हो गया है।

तब यदि आत्म-निग्रह के द्वारा जन्मनिरोध की विधि को एक श्रेष्ठ, युक्त और दोष रहित विधि मानले तो हमारे लिये अपने सामाजिक आदर्श तथा वातावरण में परिवर्तन करना आवश्यक होगा। इसके लिये एक मात्र सरल मार्ग यही है कि प्रत्येक व्यक्ति (जो आत्म नियंत्रण के सिद्धान्त में विश्वास रखता हो) अथक श्रद्धा के साथ प्रथम अपने आप में ही आरंभ करे ताकि आस पास के लोगों में उस का

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ब्रह्मचर्य साधना

प्रभाव पड़े। उनके लिये फिर विवाह संबंधी विचार (जिसके विषय में मैं पिछले सप्ताह में पूर्णतः प्रकाश डाल चुका हूँ) एक महत्वपूर्ण कार्य बन जायगा। इस युक्ति को उचित रीतिसे समझलेने पर पूर्णतः मानसिक परिवर्तन हो सकता है। इस को केवल कुछ इने गिने व्यक्ति विशेषों के लिये ही नहीं समझना चाहिये। यह नियम मनुष्य जाति के लिये प्रस्तुत किया गया है। इस नियम के भंग करने से सामाजिक स्थिति का पतन होकर, अनिच्छित संतान व नये रोगों की वृद्धि तथा धार्मिक जीवन का हास होगा। यह निश्चय है कि गर्भावरोध के कुत्रिम विधान से जन-संख्या-वृद्धि में तो कुछ सीमा तक कमी होती है, परंतु धार्मिक ग्रन्थ जो उससे व्यक्तिगत तथा समाज को होता है, वह अगणनीय है। हाँ, यह बात तो अवश्य है कि जो मनुष्य काम वासना को संतुष्ट करना ही जीवन का उद्देश्य समझते हैं, उन के लिये तो जीवन का सर्वथा पट परिवर्तन हो जाता है उन के लिये विवाह एक धर्म-संस्कार नहीं रहता। इस का अर्थ तो हमारे बहुमूल्य सामाजिक सिद्धान्तों का मूल्य घटाना है। यह निश्चय है कि इस तर्क वितर्क से उन लोगों पर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ेगा जो हमारे विवाह संबंधी पुराने सिद्धान्तों को मिथ्या समझते हैं। मेरा उक्त कथन केवल उन्हीं लोगों के लिये है जो कि स्त्री को भोग विलास की वस्तु न समझ कर उसको, पवित्र वंश-वर्धक मान रूप में गणना करते हैं।

अन्य उपाय निरर्थक

उपयुक्त सिद्धान्त जो मैंने आपको बताया है वह मेरा तथा मेरे कुछ एक मित्रों का अनुभव सिद्ध है। इसका

अन्य उपाय निरर्थक

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विवाह के पुराने विचारों के अविष्कार से भी समर्थन होता है। जहाँ तक मेरा विचार है, विवाहित जीवन में ब्रह्मचर्य धारण करने से ब्रह्मचर्य अपनी स्वभाविक स्थिति को ग्रहण करेगा तथा विवाह की यथार्त्ता को भी सरल बना देगा। जन्म निरोध के अन्य उपाय सब निरर्थक हैं। एक बार जब स्त्री-पुरुषों के यह बात अच्छी प्रकार से समझ में आ गई कि भोग-इंद्रिय का मुख्य कार्य संतानोत्पत्ति ही है तो फिर वे अन्यथा प्रसंग कर अपने वीर्य तथा बहुमूल्य शारीरिक व मानसिक शक्ति को नष्ट करना एक प्रकार का पाप समझने लेंगे। अब यह समझना सरल है कि हमारे प्राचीन वैज्ञानिकों ने वीर्य को इतना महत्व क्यों दिया है तथा क्यों उसको, समाज के हित के लिये श्रोत्र शक्ति में परिणत करने पर इतना जोर दिया है। उनकी यह घोषणा है कि जिसने अपनी जननेन्द्रिय पर पूर्णतः विजय प्राप्त की है, वही शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त कर अन्य सब अप्राप्य सिद्धियों को प्राप्त कर लेगा है।

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ब्रह्मचर्य साधना

उत्कंठाओं के द्वारा अज्ञान पूर्वक काम के वशीभूत हो जाते हैं । मनुष्य को प्रभावित करने वाली सारी लालसाओं पर विजय प्राप्त करना ही सफलता प्राप्त करने का वास्तविक उद्योग है । जब कि साधारण पुरुष व स्त्री द्वारा ब्रह्मचर्य प्राप्त करना असंभव नहीं है तथापि इससे यह नहीं समझना चाहिये कि उसमें कुछ कम पुरुषार्थ की आवश्यकता है; नहीं नहीं, उस में तो उस से भी अधिक पुरुषार्थ की आवश्यकता है जो पुरुषार्थ कि एक साधारण विद्यार्थी किसी विज्ञान (विद्या) में पूर्णत्व प्राप्त करने के लिये निष्कपट हृदय से करता है । यहाँ, ब्रह्मचर्य की प्राप्ति से तात्पर्य है जीवन-विज्ञान पर प्रभुत्व प्राप्त करना ।

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