भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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आत्मनिग्रह की विधि

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पिताओं का मुख्य कर्तव्य यही होता है कि वे अपने बच्चों का जैसे तैसे ही विवाह कर दें ताकि वे शाशकों की भांति संतानोत्पत्ति कर कुल वृद्धि करते रहें। यदि वे कन्याएं हैं तो शीघ्राति शीघ्र विवाह दी जाती हैं चाहे उन की धार्मिक शिक्षा कैसी ही क्यों न हो। आजकल की विवाहोत्सव-विधि एक दीर्घ संताप है जिस में केवल अन्धे भोजन तथा निरर्थक व्यापार के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। यहस्थी का जीवन भूत पूर्व जीवन ही के आधार पर निर्धारित है। वह आत्म भोग-विलास का विस्तार है। छुट्टियाँ तथा आनंदोपभोगों के सामाजिक त्योहार भी ऐसे बनाये गये हैं जिन में विषयी जीवन-यापन करने में विवस होने की अधिकाधिक संभावना रहती है। शिक्षा ही ऐसी दी जाती है जो मनुष्य को पशु जीवन की ओर ले जाने में सहायता प्रदान करती है। अधिकतम अर्वाचीन शास्त्र-ज्ञान-प्रणाली के अनुसार विषय भोग करता कर्तव्य है तथा उस से परे रहना पाप है।

आत्मनिग्रह की विधि

इस में कोई आश्रय नहीं कि कामवासना पर विजय प्राप्त करना एक प्रकार का असंभव सा हो गया है।

तब यदि आत्म-निग्रह के द्वारा जन्मनिरोध की विधि को एक श्रेष्ठ, युक्त और दोष रहित विधि मानले तो हमारे लिये अपने सामाजिक आदर्श तथा वातावरण में परिवर्तन करना आवश्यक होगा। इसके लिये एक मात्र सरल मार्ग यही है कि प्रत्येक व्यक्ति (जो आत्म नियंत्रण के सिद्धान्त में विश्वास रखता हो) अथक श्रद्धा के साथ प्रथम अपने आप में ही आरंभ करे ताकि आस पास के लोगों में उस का