भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

DevanagariHindipublished237 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 167

१५२

ब्रह्मचर्य साधना

की भाँति, एक प्रकार की बहुमूल्य प्राण या जीव-शक्ति उत्पन्न होकर परिपक्व होती है। इस जीवन-शक्ति का नाम रज है। यद्यपि यह रज वास्तव में स्त्री के शरीर से वाहिर तो नहीं आता (जैसे कि पुरुष का वीर्य) तथापि मिथुन-क्रिया के कारण वह अंडाशय को छोड़ गर्भाधान की प्रक्रिया में नियुक्त होता है। गर्भवती स्त्री को जो पीड़ा होती है वह कोई नहीं जान सकता, क्योंकि कहा है “प्रसूति की पीड़ा प्रसूति ही जानें”। इस शक्ति के चार चार क्षीण होने तथा प्रसव पीड़ा के कारण दुःखील और स्वस्थ स्त्रियाँ भी अस्थि-पंजर बन जाती हैं। इस से उन के बल, रूप, लावण्य, जीवन तथा उनकी मानसिक शक्ति पर अति विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। अतिरिक्त शक्तियों के क्षीण होने से तथा नैत्र, में चमक, नहीं रहती नेत्र-दृष्टि कम होजाती है।

विषय-भोग की इंद्रियजन्य तीव्र उत्तेजना के कारण नाड़ी मंडल प्रभावित होता है तथा दुर्बलता आ जाती है स्त्रियों के शरीर अधिक कोमल और लचीले होने के कारण, उन पर प्रायः पुरुषों से भी अधिक बुरा प्रभाव पड़ता है उन्हें भी चाहिये कि वे अपनी बहुमूल्य शक्ति को क्षीण न होने दें।

अंडाशयों से खाचित जो रजादि रस हैं वे स्त्रियों की शारीरिक और मानसिक पुष्टि के लिये अत्यंत आवश्यक हैं।

(६) उत्पत्ति आवरोध (जन्म-निरोध) की विधि माहात्मा गांधी जी अपने “हरिजन” में लिखते हैं:- आज हमारे समाज में ऐसी कोई भी बात नहीं है जो हमें जन्म-निरोध की विधि की ओर प्रवृत्त करे। हमारी प्रारम्भिक शिक्षा ही उसकी किरीडी है। आजकल माता