ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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“यह भी गुजर जायगा” ।
आम रास्ते पर एक मीनार में,
जो प्रायः बीस गज ऊँची थी;
उसकी एक पत्थर की मूर्ति प्रतिष्ठित थी
राजाने एक दिन अज्ञात छिपेवेश में,
जब देखा अपने अंकित नाम को
तो बिचार किया “कीर्ति क्या है” ।
यश भी शनैः शनैः नष्ट होने वाला है—
“यह भी गुजर जायगा” ।
पद्माघात से ग्रस्त, अशक्त, वृद्ध वह राजा,
स्वर्णद्वारों पर प्रतीक्षा करता हुआ,
अपने अंतिम स्वास द्वारा कहने लगा,
“जीवन तो समाप्त हुआ, पर मृत्यु क्या है ?”
तब उसके उत्तर में,
उसकी अंगूठी पर एक प्रकाश पड़ा,
वह दिव्य प्रकाश यही बताता गया,
“यह भी गुजर जायगा” । —थियोडोर टिल्टन
(५) क्या स्त्रियों के लिये ब्रह्मचर्य आवश्यक है ?
प्रश्नः—वीर्य की उत्पत्ति तथा उसके लय संबंधी सिद्धान्त जो पुरुषों को लागू होते हैं ? क्या वे ही सिद्धान्त स्त्रियों को भी लागू होते हैं ? क्या वे भी वास्तव में उसी प्रकार प्रभावित होती हैं जिस प्रकार कि मनुष्य ?
उत्तरः—आप का प्रश्न महत्वपूर्ण और प्रासंगिक है । हाँ, मनुष्य की भौति, मैथुन से स्त्री का शरीर शून्य होता है तथा उसकी शक्ति भी क्षीण होती है । नाकी गंडल पर भी उसका प्रभाव वास्तव में बहुत तीव्र पड़ता है । स्त्रियों के अंडाशयों (जो पुरुषों के तत्स्थानी होते हैं) में वीर्य