भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य साधना

उसके लिये अनमोल मोती आने थे; परंतु वह इस धन-निधिको तुच्छ ही समझता, तथा उसको अपनी न जान कर कुछ भी महत्व नहीं देता; वह तो केवल यही कहता “यह धन किस काम का है ?” “यह भी गुजर जायगा ।”

अपने रागजह में भोग-विलासावस्था में, असीम आनंद के अवसर पर भी, जब उसके अतिथि तथा मित्रवर्ग, तालियाँ बजा कर दिल्ली उड़ाते वह यही कहता “ए मेरे प्यारे मित्रों ! सुख (भोग) आते हैं, पर सदा के लिये नहीं, “यह भी गुजर जायगा ।”

अनुपम सुंदर स्त्री जो कभी देखने में न आईं हो, उसकी विवाहिता राज-रानी थी, विवाह की सुख-रौशना पर लेटे हुए भी, उसने धीरे से अपनी आत्मा से कहा :— यदिपि किसी भी राजा ने आज तक, ऐसी सुंदरी युवति का आलिंगन नहीं किया है, तथापि यह मृतक शरीर केवल मिट्टी है- “यह भी गुजर जायगा” ।

भीषण रणक्षेत्र में युद्ध करते हुए, एक बार शत्रुके भाले से उसका ढाल बिंद गया; उच्चस्वर से विलाप करते हुए उसके सिपाही, उसके संधर सिक्त शरीर को डेरे पर ले आये, पीड़ा की वेदना के कारण विलाप करते हुए, उसने कहा “पीड़ा असह्य है”

परंतु, धैर्य के साथ, धीर धीरे,