ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य माला
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को वश में करके मेरे में लगे हुए चित्तवाला, मेरे परायण हुआ स्थित होते।
—गीता, अध्याय ६. श्लोक १८.
बुद्धि, विशेषतः स्मरणशक्ति की दुर्बलता, दुराचारियों की मानसिक दुर्बलता का लक्षण है।
—डाकर लुइम.
भीष्मपितामह धर्म-पुत्र युधिष्ठिर से कहते हैं “ह राजन् ! जो मनुष्य आजन्म पूर्ण ब्रह्मचारी रहता है, उसके लिये, इस संसार में, कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है जो वह न प्राप्त कर सके। एक मनुष्य चारों वेदों का जानने वाला है, और दूसरा पूर्ण ब्रह्मचारी है; इन दोनों में ब्रह्मचारी ही श्रेष्ठ है।”
—महाभारत
(४) शाहंशाह की झँगूठी—एक सलाहकारी मित्र
(वैराग्य की वृद्धि कीजिये)
एक बार परसिया में एक राजा राज्य करता था.
जिसके पास एक राजकीय झँगूठी थी,
उस पर एक विवेकयुक्त अनोखा सिद्धान्त खुदा हुआ था.
ज्यों ही वह उसे अपने नेत्रों कैसामने लेता
ज्यों ही वह उसे तत्काल एक
यभोन्मित, समयानुबल सम्मति देती,
वे थे पवित्र शब्द और वे थे हैं,—
“यह भी गुजर जायगा”
ऊंटों के कफिले गेतीले मैदानों से होकर.
ममरुंद से उसके लिये बहुमूल्य रत्न लाती था;
नौका ममुदाय के द्वारा समुद्रों की राह से.