ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
धनवानों, नास्तिकों तथा शत्रुओं तथा काम के संबंधी धार्तालाप कभी अवश्य न कीजिये ।
—नारद
शरीर से वीर्य-पात होने पर मृत्यु का शीघ्रगमन होता है; वीर्य की रक्षा करने से जीवन की रक्षा व आयु की वृद्धि होती है ।
वीर्य-पतन से ही अकाल मृत्यु होती है, इस में संदेह नहीं; इस बात को ध्यान में रखते हुए योगी को चाहिये कि वह वीर्य की सदा रक्षा करे और पूर्ण पवित्रता का जीवन व्यापन करे ।
—शिव संहिता
मैथुन संबंधी ये प्रवृत्तियाँ, सर्व प्रथम तो तरंगों की भांति ही प्रतीत होती हैं, परंतु आगे चलकर वे कुसंगति के कारण एक विशाल समुद्र का रूप धारण कर लेती हैं ।
—नारद
वेद के जानने वाले विद्वान जिस को ऊँच कार नाम से कहते हैं, और आसक्ति रहित सन्यासीगण जिस में प्रवेश करते हैं तथा जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिये संक्षेप में कहूँगा ।
—गीता अध्याय ८. श्लो-२
जो पुरुष कर्मैन्द्रियों को हठपूर्वक रोक कर, इंद्रियों के गोरों को मन से चिंतन करता रहता है वह मूढ़बुद्धि, मिथ्याचारी शर्मान् दग्भी कहा जाता है ।
—गीता अध्याय ३. श्लोक ६.
शान्त निच, भय रहित, ब्रह्मचर्य के त्रत में स्थित, मन