ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
में मर्त्य-प्रकार के प्रलोभनों से अजेय हूँ।
में अपनी महती इच्छा-शक्ति के द्वारा पर्वतों का उन्मूलन कर सकता हूँ;
में क्षण भर में समुद्रों का शोषण कर सकता हूँ;
में ऐक्चरी मुद्रा द्वारा आकाश में उड़ सकता हूँ;
में अपनी अंगुलियों द्वारा सूर्य को भी स्पर्श कर सकता हूँ;
रिषियों और सिद्धियों तो अब मेरे चरणों में जुड़कती हैं।
में गर्म कढ़ी और चटनियों का त्याग करता हूँ;
में दूध, फल, और गेहूँ की रोटी द्वारा अपना जीवन यापन करता हूँ;
मैंने चल-चित्रों, उपन्यासों तथा कुसंगति का सर्वथा त्याग कर दिया है;
मैं महात्माओं के संग में रहता हूँ तथा जप, ध्यान करता हूँ;
मैं निःश्व प्रातःकाल ब्राह्ममूर्त में तीन या साढ़े तीन बजे उठता हूँ;
और अद्वा, प्रेम और भाव के साथ भगवान का चिंतन करता हूँ;
मैं एकान्त में, हिमगिरि की कंदराओं में रहना पसंद करता हूँ;
गंगा तट पर वास करने से मेरे मन में ईश्वर-प्रेरणा का संचार होता है;
मैं सदा सर्वथा कर्म में संलग्न ही रहता हूँ;
कुसित विचारों को दूर रखने के लिये यह सर्वभेद साधन है;