ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
ऐच्छिक हों अथवा अनैच्छिक प्राण शक्ति का व्यय होता है। यह सर्व मान्य है कि ऋषि के सारे बहुमूल्य तत्व वीर्य में पाये जाते हैं। यदि यह सत्य है तो यह सिद्ध हो जाता है कि पवित्र जीवन मनुष्य के लिये अत्यन्त आवश्यक है।”
कार्य सिद्धि करने के लिये ब्रह्मचर्य ही नींव है
पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। यह बहुत ही आवश्यक है। योग के अभ्यास से वीर्य श्रोजस् शक्ति में परिणत हो जाता है। श्रोजस् शक्ति की वृद्धि के द्वारा सारे जीव-कोष शक्ति तथा पोषण प्राप्त करते हैं। ब्रह्मचर्य, प्राणायाम, शीर्षासन तथा अन्य हठवैज्ञानिक क्रिया के द्वारा और ध्यान के द्वारा सारे शरीर का नव निर्माण होता है। हर जीव-कोष को नूतन बल, वीर्य तथा स्फूर्ति प्राप्त होते हैं। योगी को पूर्ण शरीर की प्राप्ति होती है। उसकी गति में आकर्षण तथा लावण्य रहता है। वह जब तक चाहे जी सकता है (इच्छा मृत्यु)। यही कारण है कि भगवान् श्री कृष्ण शत्रुघ्न से कहते हैं—“तस्मात् योगी भवाशुघ्न—इसलिये हे शत्रुघ्न तू योगी बनजा।”
ब्रह्मचर्य का महत्व
“ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाच्यन्त”—वेदों की यह घोषणा है कि ब्रह्मचर्य तथा तपस्या के द्वारा देवताओं ने मृत्यु पर भी विजय पाली है। हनुमान जी महावीर कैसे हो गये। ब्रह्मचर्य के श्रद्ध के द्वारा ही उन्होंने अपूर्ण शक्ति तथा बल की प्राप्ति की थी। पाण्डव तथा कौरवों के पितामह महान् भीष्म ने भी ब्रह्मचर्य के द्वारा ही मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी। लक्ष्मण जी भी ब्रह्मचारी ही थे जिन्होंने