भारतकोश
ब्रह्मचर्य साधना

ब्रह्मचर्य साधना

Brahmacharya Sadhana

स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा

स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य का महत्व

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रावण के पुत्र तीनों लोकों के विजेता, अज्जय, मेघनाद का संहार किया था। यहां तक कि भगवान राम भी मेघनाद का संहार न कर सके। ब्रह्मचर्य के द्वारा ही लक्ष्मण ने मेघनाद को पराजित कर सके थे। पृथ्वीराज की महानता तथा वीरता का कारण भी ब्रह्मचर्य ही था। इन तीनों लोकों में कोई भी वस्तु इस तरह की नहीं है जो कि ब्रह्मचर्य के बल से प्राप्त न की जा सकती हो। प्राचीन काल के मुनिगण ब्रह्मचर्य के मूल्य को भली प्रकार से जानते थे और यही कारण है कि उन लोगों ने अश्वत्थ सुन्दर श्लोकों में ब्रह्मचर्य की स्तुति गाई है।

श्रुति घोषित करती है—“नायमात्मा बलहीनैव लभ्य- -यह आत्मा बल हीनों को प्राप्य नहीं है।” गीता में आप पायेंगे—यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यम् चरन्ति—जिसके लिये ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं” अध्याय ७-११। “त्रिविधम् नरकस्येदम् द्वारं नाशानमात्मनः काम क्रोधस्तथा लोभस्तस्मात्तेजयम् त्यजेत्—हे अर्जुन ! नरक के तीन द्वार हैं, जो आत्मा के नाशक हैं : वे हैं काम, क्रोध तथा लोभ मनुष्य को इन तीनों का परित्याग करना चाहिए।” “जहि शतुं महाबाहो कामरूपम् दुरासदम्” ब्रह्मचर्य के पालन के द्वारा इस महाशतु को मार डालिये।

योग दर्शन में भी ब्रह्मचर्य पर बहुत बल डाला गया है। देखिये संहिता क्या कहती है—“भरणम् विन्दु पातेन जीवनम् विन्दु धारणात्” शरीर से वीर्य पात होने पर मृत्यु निकट आती है तथा शरीर में इसके पच जाने से जीवन की रक्षा होती है तथा दीर्घायु प्राप्त होती है ! अन्न : यही सावधानी से इसकी रक्षा करनी चाहिये। “अद्यते मृत्युते लोके विन्दुना नात्र संशयः, एतत् श्राव्या सदा दत्ते-