ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य साधना
विन्दु धारणम् आचरेत्—इसमें सन्देह नहीं कि लोग वी को धारण करके जीते तथा दीर्घायु प्राप्त करते हैं तथा वीर्य क्षय से अकाल मृत्यु को पाते हैं। ऐसा जानकर योगी को सदा अपने वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। उसको अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।”
योरप के विद्वान डाक्टर भी भारत के योगियों का समर्थन करते हैं। डा० लुई कहते हैं—“सारे शरीर विशेषज्ञ इस बात से सहमत हैं कि स्त्रिय के सर्वोत्तम अंश से वीर्य की उत्पत्ति होती है।” डा० निकोल का कहना है कि “यह शौपधीय तथा शारीरिक सत्य है कि स्त्रिय के सर्वोत्तम अंश से प्रजनन तत्वों का निर्माण होता है। शुद्ध जीवन में इन तत्वों का पुनर्प्राप्ति हो जाता है। यह स्त्रिय प्रयाली में पुनः पञ्चक सूक्ष्म प्रस्तित्क, स्नायु तथा मांस पेशियों का निर्माण करता है। वीर्य के पुनः पञ्च जाने से मनुष्य बली, वीर्यवान्, उत्साही तथा वीर बनता है। इसके क्षय से वह पुरुषत्व हीन, दुर्बल, कमजोर, कामोत्तेजन की प्रवृत्ति, दुर्बल स्नायु, मृगी, अन्यान्य व्याधियों तथा मृत्यु का भी शिकार हो जाता है। प्रजनन अंगों के निरोध से मानसिक तथा आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होती है।” सेंट पाल तथा सर आइज़क न्यूटन के नैतिक चरित्र की ओर इंगित करते हुये डाक्टर लुई कहते हैं—“बुद्धि की कमजोरी विशेष कर स्मृति की दुर्बलता इस बात को परिलक्षित करती है कि मनुष्य ने विषय परायणता के कारण मनः शक्ति का ह्रास कर डाला है।” चौबीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य अधम, छत्तीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य मध्यम है तथा अष्टात्तीस वर्षों तक का ब्रह्मचर्य उत्तम है। “पुरुषभाव चतुर्विंशति वर्गाणि”—त्रेदों के अनुसार चौबीस वर्षों तक ब्रह्म-