ब्रह्मचर्य साधना
Brahmacharya Sadhana
स्वामी शिवानन्द सरस्वती द्वारा
स्रोत: 1980 Hindi 2nd Edition (Yoga-Vedanta Forest Academy) · Yoga-Vedanta Forest Academy / The Divine Life Trust Society, Rishikesh · 1980 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य का महत्व
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चर्य का पालन करना चाहिये। ५५ या साठ वर्षों तक ग्रहस्थ धर्म का पालन करना चाहिये। “पंचाशोषेते वनं व्रजेत” पंचास वर्ष की आयु के बाद आर्य को परमात्मा की खोज में तपोवन जाना चाहिये। ७५ वर्ष की आयु तक वाग्प्रस्थ का जीवन बिताना चाहिये। तथा उसके बाद मृत्यु पर्यन्त भिन्न ग्रन्थवा संन्यास धारण करना चाहिये।
आजकल बच्चों के भी बच्चे होते हैं। बालविवाह द्वारा भौतिक विगटन तथा वीर्यनाश हो चला है। बुद्धि के अभिमानी मनुष्य को पत्नियों तथा जानवरों से शिक्ता ग्रहण करनी चाहिये। सिंह, हाथी तथा अन्य शक्तिशाली जानवरों में मनुष्य से कहीं अधिक आत्म-मंजम है। सिंह गाल में एक धार ही मैथुन करते हैं। गर्भ धारण के पश्चात् स्त्री जाति के जानवर पुरुष जाति के जानवरों के तब तक पाम में नहीं आने देते जब तक कि उनके बच्चे पुष्ट नहीं हो जाते। वे स्वयं भी स्वस्थ नहीं हो जातीं। मनुष्य ही प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करता है तथा फलतः अनेकानेक रोगों का शिकार बन जाना है। वह जानवरों से भी निचले स्तर में आ गिरा है। आहार, निद्रा, भय तथा मैथुन—ये तो जानवरों तथा मनुष्यों में समान हैं। मनुष्य अपनी विचार शक्ति के कारण ही जानवरों तथा प्राणों में जेद रखता है। यदि उसमें विचार शक्ति नहीं है तो वह भी जानवर ही है।
पश्चिम के प्रख्यात डा० शतलाते हैं कि वीर्य चय से विशेष कर सुवायस्था में, बहुत से रोग पैदा होते हैं— शरीर में भान, चेहरे पर कुखिया, आंखों के चारों ओर नीली धारियाँ, दाढ़ी का अभाव, गर्भ खाखें, पीला चेहरा,